
बेंगलुरु में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जहां उम्रकैद की सजा काट रहा एक कैदी कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फर्जी आदेश के आधार पर जेल से बाहर निकल गया। हैरानी की बात यह है कि यह मामला सामने आने और कार्रवाई होने में करीब आठ साल लग गए।
बेंगलुरु पुलिस ने इस मामले में उम्रकैद की सजा पाए शंकर ए. अराध्या और जेल के एक कर्मचारी श्रीकांत एस. को गिरफ्तार किया है। दोनों पर फर्जी दस्तावेज तैयार करने और कैदी को जेल से बाहर निकालने में भूमिका निभाने का आरोप है।
2001 के अपहरण मामले में मिली थी उम्रकैद
पुलिस के मुताबिक, शंकर ए. अराध्या साल 2001 में चिकपेट पुलिस थाने में दर्ज फिरौती के लिए अपहरण के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा था। फास्ट ट्रैक कोर्ट-I ने 12 जुलाई 2004 को उसे उम्रकैद और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। अराध्या ने सजा के खिलाफ कर्नाटक हाई कोर्ट का रुख किया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा, लेकिन दोनों जगह उसकी सजा बरकरार रही।
पत्नी की जेलकर्मी से हुई थी मुलाकात
पुलिस के अनुसार, अराध्या को कई बार पैरोल पर जेल से बाहर आने की अनुमति मिली थी। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इसी दौरान उसकी पत्नी की मुलाकात जेल कर्मचारी श्रीकांत एस. से हुई। उस समय श्रीकांत बेंगलुरु सेंट्रल जेल के कन्विक्ट सेक्शन में सेकंड डिविजन असिस्टेंट (एसडीए) के तौर पर काम कर रहा था।
कन्विक्ट सेक्शन में कैदियों से जुड़े रिकॉर्ड और दस्तावेजों का काम होता है। इसमें सजा, जेल में दाखिले और रिहाई की तारीख से जुड़े रिकॉर्ड के साथ-साथ पैरोल और रिहाई की प्रक्रिया से संबंधित कागजात भी शामिल होते हैं।
पुलिस का आरोप है कि अराध्या की पत्नी ने पति को जेल से बाहर निकालने में मदद के लिए श्रीकांत से संपर्क किया था। श्रीकांत ने कथित तौर पर इसके लिए 12 लाख रुपये मांगे और भरोसा दिलाया कि वह अराध्या की रिहाई की व्यवस्था कर सकता है।
12 लाख मांगे, 6 लाख देने का आरोप
पुलिस के मुताबिक, अराध्या के परिवार ने 6 लाख रुपये जुटाए और कथित तौर पर यह रकम श्रीकांत को दी गई। इसके बाद जांचकर्ताओं को शक है कि श्रीकांत ने अराध्या के आपराधिक मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की फर्जी कॉपी तैयार की।
इस कथित फर्जी आदेश में ऐसा दिखाया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने अराध्या को जेल से रिहा करने का निर्देश दिया है। पुलिस के अनुसार, अराध्या को अपने पिता से निर्माण कारोबार विरासत में मिला था।
नवंबर 2018 में जेल से हुआ था रिहा
पुलिस शिकायत के मुताबिक, नवंबर 2018 में जेल अधिकारियों को कुछ दस्तावेज मिले थे। इन दस्तावेजों में दावा किया गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने अराध्या की रिहाई का आदेश दिया है। कथित आदेश पर 2 नवंबर 2018 की तारीख दर्ज थी।
जेल अधिकारियों ने इन दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई करते हुए 13 नवंबर 2018 को अराध्या को बेंगलुरु सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया। बताया गया है कि रिहाई से पहले उसने कथित तौर पर अदालत द्वारा लगाए गए जुर्माने की रकम भी जमा की थी।
आठ साल बाद खुला फर्जी आदेश का राज
मामला इस साल मई में सामने आया, जब बेंगलुरु सेंट्रल जेल के प्रभारी अधीक्षक ने शिकायत दर्ज कराई। जांच के दौरान सामने आया कि अराध्या की रिहाई के लिए जमा किया गया सुप्रीम कोर्ट का आदेश कथित तौर पर फर्जी था।
इसके बाद परप्पना अग्रहारा पुलिस ने अराध्या के खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी और भारतीय दंड संहिता की अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। जांच आगे बढ़ने पर जेल कर्मचारी श्रीकांत की कथित भूमिका भी सामने आई और पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया।