भारत की आजादी के 79 साल के सफर में देश ने टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में लंबी दूरी तय की है. कभी भारत विदेशी मशीनों और तकनीक पर निर्भर था. आज देश सॉफ्टवेयर, डिजिटल पेमेंट और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में बड़ी ताकत बन चुका है. इतना ही नहीं, अब AI और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में भी लोहा मनवाने की बड़ी तैयारी चल रही है. आज पूरी दुनिया की टेक्नोलॉजी पर भारत का असर दिखाए दे रहा है, लेकिन चरखे से शुरुआत करने वाले भारत का इस मुकाम तक पहुंचने का सफर इतना आसान नहीं था. भारत की इस यात्रा की जड़ें आजादी से पहले के स्वदेशी आंदोलन तक जाती हैं.

1905 में स्वदेशी आंदोलन ने लोगों से विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने और देश में सामान बनाने की अपील की थी. उस समय इसका मकसद आर्थिक आत्मनिर्भरता था. आज यही सोच सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और AI जैसी आधुनिक तकनीकों तक पहुंच गई है. आज भारत में 1.09 अरब से ज्यादा इंटरनेट सब्सक्राइबर और करीब 1.06 अरब ब्रॉडबैंड सब्सक्राइबर हैं. NASSCOM के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में देश का टेक्नोलॉजी सेक्टर 315 अरब डॉलर से ज्यादा का हो सकता है.
आजादी के बाद तैयार हुई नींव
आजादी के बाद भारत ने सबसे पहले वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता तैयार करने पर ध्यान दिया. 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना शुरू हुई. इसी साल IIT खड़गपुर ने भी अपना शैक्षणिक कार्यक्रम शुरू किया. 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग, 1954 में परमाणु ऊर्जा विभाग और 1958 में DRDO की स्थापना हुई. इसके बाद अंतरिक्ष और टेलीकॉम के क्षेत्र में भी भारत ने अपनी क्षमता विकसित की.
1969 में ISRO की स्थापना हुई और 1975 में भारत का पहला उपग्रह आर्यभट्ट अंतरिक्ष में पहुंचा. 1984 में CDOT ने देश में स्वदेशी टेलीकॉम तकनीक विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया. कंप्यूटर के क्षेत्र में भी भारत ने आत्मनिर्भरता की कोशिश की. अमेरिका से सुपरकंप्यूटर की तकनीक नहीं मिलने के बाद 1988 में CDAC बनाया गया. इसी संस्था ने आगे चलकर PARAM सुपरकंप्यूटर की सीरीज विकसित की.
1991 के बाद IT सेक्टर ने पकड़ी रफ्तार
1991 में आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत की टेक्नोलॉजी यात्रा तेजी से बदल गई. टेलीकॉम में निजी कंपनियों की एंट्री हुई और इंटरनेट का विस्तार शुरू हुआ. TCS, Infosys, Wipro और HCL जैसी कंपनियां तेजी से बढ़ीं. बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे बड़े टेक्नोलॉजी सेंटर बन गए. Y2K और BPO के दौर ने भारत को दुनिया के बड़े IT और बैक ऑफिस हब के रूप में पहचान दिलाई. जो टेक सेक्टर कभी छोटा था, वह अब करीब 315 अरब डॉलर का उद्योग बन चुका है और इसमें करीब 60 लाख लोगों को सीधे रोजगार मिलता है.
UPI ने बदली डिजिटल अर्थव्यवस्था
स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट ने भारत की डिजिटल क्रांति को और तेज किया. आधार ने डिजिटल पहचान बनाई, जनधन खातों ने लोगों को बैंकिंग से जोड़ा और मोबाइल इंटरनेट ने इन सेवाओं को घरघर पहुंचाया. इसके बाद UPI ने डिजिटल पेमेंट की तस्वीर बदल दी. NPCI के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2026 में UPI पर 23.66 अरब ट्रांजैक्शन हुए, जिनकी कुल कीमत करीब 29.88 लाख करोड़ रुपये रही. UPI की खासियत यह है कि बैंक, फिनटेक कंपनियां, दुकानदार और ग्राहक एक ही डिजिटल सिस्टम पर जुड़ सकते हैं. भारत में जून 2026 तक UPI यूजर्स की संख्या 55.49 करोड़ से अधिक हो चुकी है.
अब सॉफ्टवेयर से आगे बढ़ रहा भारत
भारत की टेक्नोलॉजी कहानी अब सिर्फ सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं है. सरकार इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग को भी बढ़ावा दे रही है. PLI योजनाओं के तहत मार्च 2026 तक 2.40 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश आया और 14.15 लाख से ज्यादा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा हुए. इस दौरान 15.2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निर्यात भी हुआ. इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में भी तेजी आई है. मार्च 2026 तक इस क्षेत्र में निवेश 20,600 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच गया था.
अब चिप और AI पर बड़ा दांव
भारत अब सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में भी आगे बढ़ना चाहता है. जुलाई 2026 में केंद्र सरकार ने Semicon 2.0 को मंजूरी दी, जिसके लिए 1.27 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. चिप इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि स्मार्टफोन, कार, टेलीकॉम उपकरण, डिफेंस सिस्टम, डेटा सेंटर और AI जैसी लगभग हर आधुनिक तकनीक में इनका इस्तेमाल होता है. इसके साथ भारत AI मिशन पर भी काम चल रहा है. इसके लिए 10,371.92 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है. AI कंप्यूटिंग के लिए 2026 की शुरुआत तक 38,000 से ज्यादा GPUs को जोड़ा जा चुका था.
अगली चुनौती सिर्फ तकनीक बनाना नहीं
भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर यानी GCC भी अब सिर्फ बैक ऑफिस नहीं रह गए हैं. ये सेंटर AI, साइबर सिक्योरिटी, क्लाउड और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में रिसर्च और इंजीनियरिंग का काम कर रहे हैं. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। 2024 में भारत में 1,700 से ज्यादा GCC थे, जिनमें करीब 19 लाख प्रोफेशनल काम कर रहे थे. हालांकि, आगे की राह आसान नहीं है. भारत को रिसर्च और डेवलपमेंट पर और ज्यादा खर्च करने की जरूरत होगी. 202021 में देश का R&D खर्च GDP का सिर्फ 0.64% था. यही वजह है कि भारत के लिए अगला दौर सिर्फ इंजीनियर तैयार करने का नहीं है. अब देश को यूनिवर्सिटी, रिसर्च, प्राइवेट इन्वेस्टमेंट, मैन्युफैक्चरिंग, AI कंप्यूटिंग और प्रतिभा को एक साथ जोड़ना होगा.
स्वदेशी का बदला हुआ मतलब
1905 में स्वदेशी का मतलब था भारत में इस्तेमाल होने वाला सामान देश में बनाना. आज इसका मतलब काफी बड़ा हो गया है. अब भारत सिर्फ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं करना चाहता, बल्कि उसे बनाना, उसका मालिक बनना और दुनिया को निर्यात करना चाहता है. चरखे से शुरू हुआ यह सफर आज सैटेलाइट, सॉफ्टवेयर, UPI, AI और सेमीकंडक्टर तक पहुंच चुका है. आने वाले सालों की सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि भारत तकनीक का सिर्फ बड़ा बाजार न बने, बल्कि दुनिया के लिए टेक्नोलॉजी बनाने वाला बड़ा केंद्र भी बने.