paper leak & Protest: छात्रों के नाम पर अराजकता फैलाने की साजिश? जानें पूर्व सरकारों के दौर में पेपर लीक का हाल

paper leak & Protest: छात्रों के नाम पर अराजकता फैलाने की साजिश? जानें पूर्व सरकारों के दौर में पेपर लीक का हाल

पिछले कुछ दिनों में नीट परीक्षा को लेकर देश और प्रदेश में जो कुछ देखने को मिला, वह कई तरह के सवाल खड़े करता है. पहला तो यही कि क्या छात्रों की पढ़ाईलिखाई या परीक्षा से जुड़ा मुद्दा राजनीतिक स्वार्थ और सत्ता संघर्ष का माध्यम बन गया है और इसी से जुड़ा सवाल यह भी है कि आखिर राजनीतिक दल क्यों इस आंदोलन को अराजकता की दिशा में ले जाना चाहते हैं? क्या यह वाकई अब छात्रों की लड़ाई रह गई है या फिर इसके बहाने मुद्दाविहीन विपक्ष द्वारा राजनीतिक जमीन तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है? यह सवाल उद्वेलित करने वाले हैं. कोई संशय नहीं कि नीट पेपर का लीक होना एक आपराधिक घटना है, चिंता का विषय है लेकिन जब कोई संवेदनशील मुद्दा राजनीतिक मंच में बदल जाता है तो कहानी नया रंग ले लेती है.

paper leak & Protest: छात्रों के नाम पर अराजकता फैलाने की साजिश? जानें पूर्व सरकारों के दौर में पेपर लीक का हाल

दिल्ली की सड़कों और उत्तर प्रदेश में राजनीतिक प्रदर्शन इस बात की पुष्टि करते हैं कि छात्रों की शिकायत को चेहरा बनाकर कुछ पार्टियां खासतौर पर सपा व कांग्रेस अपना खोया जनाधार हासिल करना चाहती हैं. विपक्षी दलों के बीच इस करने की होड़ मची है और इसका प्रमाण यह है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में एक धरना आयोजित हुआ, तो उसके बाद प्रदेश कांग्रेस ने एक समानांतर प्रदर्शन खड़ा कर दिया. छात्रों के एक प्रतिनिधि आंदोलन पर राजनीतिक दल यह साबित करने की कोशिश में जुट गए कि उस पर उनका नेतृत्व है.

महत्वपूर्ण मुद्दा क्या है

इस बात की चिंता भी नहीं कि उनकी यह कोशिश उनकी प्राथमिकता को उजागर कर देगी कि उनके लिए महत्वपूर्ण क्या है, छात्रों का हित या राजनीतिक मंच. आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह द्वारा कांग्रेस के धरने पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया जाना इस बात का प्रमाण है कि विपक्षी खेमे में भी इस मुद्दे को लेकर आंतरिक कलह व खींचतान शुरू हो चुकी है.

प्रो. संजय सिन्हा, डीन, स्किल फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज एंड रिसर्च, श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय, पलवल

इस प्रकरण के एक और पहलू को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. प्रदर्शन के दौरान सामने आए कुछ वीडियो में कई छात्र व अभिभावक यह बयान देते नजर आए कि वे नीट पेपर लीक के विरोध में छात्रों के प्रदर्शन में आए थे, लेकिन धरनास्थल पर उपस्थित राजनेताओं ने बातचीत का रुख अन्य दिशाओं में मोड़ दिया. जब किसी छात्र आंदोलन के भीतर से ऐसी आवाज़ें उठने लगें कि मूल मुद्दे से हटकर बातें हो रही हैं, तो यह प्रदर्शनरत छात्रों के लिए भी चिंतन का विषय बनना चाहिए. एक आंदोलन जो शिक्षा व्यवस्था में सुधार और परीक्षा की पवित्रता बचाने के लिए शुरू हुआ था, अगर वह अलगअलग राजनीतिक नारों और असंबद्ध विवादों में उलझने लगे, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं छात्रों को होगा, जिनके नाम पर यह सब खड़ा किया गया.

सुरक्षा को लेकर उपजी चिंता भी गंभीर विषय

संसद परिसर के आसपास सुरक्षा को लेकर उपजी चिंता भी एक गंभीर विषय है. किसी भी लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार बुनियादी है, लेकिन जब भीड़ किसी संवैधानिक संस्थान की सुरक्षासीमा के करीब पहुंचने की स्थिति पैदा करे, तो यह प्रशासन और आयोजकों दोनों के लिए एक गंभीर उत्तरदायित्व का प्रश्न बन जाता है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। ऐसी स्थितियों में जिम्मेदार राजनीतिक नेतृत्व से यह अपेक्षा की जाती है कि वह भीड़ को संयमित रखे, न कि उसे और उकसाए. लेकिन सपा व कांग्रेस नेता अराजकता को बढ़ावा देते दिखाई दिए. यदि आंदोलन को समर्थन देने वाले दलों ने सुरक्षा जोखिम की आशंका के बावजूद मार्च को प्रोत्साहित करना जारी रखा, तो यह सवाल वाजिब है कि क्या उनके लिए राजनीतिक लाभ, बच्चों की सुरक्षा से ऊपर है.

अब बात करते हैं मूल मुद्दे की. पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ी निस्संदेह एक वास्तविक और गंभीर समस्या है. लेकिन, यह कोई नई घटना नहीं है. बीते वर्षों में विभिन्न राज्यों में, चाहे किसी भी दल का शासन रहा हो, प्रश्नपत्रों के लीक होने की घटनाएं सामने आती रही हैं. अचरज की बात यह है कि जिन राजनीतिक दलों के शासनकाल में बारबार भर्ती परीक्षाएं विवादों में रहीं, वही आज स्वयं को नैतिकता का सबसे बड़ा प्रहरी सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के दौरान पुलिस भर्ती, शिक्षक भर्ती, अधीनस्थ सेवा आयोग और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर अनेक विवाद सामने आए. चयन आयोगों में जाति विशेष के लोगों को प्रमुख बनाने पर सवाल खड़े हुए. भाईभतीजावाद व रिश्वतखोरी के मामले भी सामने आए. सपा आज तक इन आरोपों पर बगलें झांकने लगती है.

यूपी के साथ बिहार और राजस्थान का हाल

इसी तरह बिहार में शिक्षक नियुक्तियों और अन्य परीक्षाओं को लेकर प्रश्न उठे. राजस्थान में कांग्रेस सरकार के दौरान भी ऐसा ही हुआ. पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती घोटाले ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया. ऐसे उदाहरणों के बाद जनता छात्र आंदोलन में घुसे विपक्षी दलों से यह पूछने का अधिकार रखती है कि जब वे सत्ता में थे तब ऐसी घटनाओं को रोकने में क्यों विफल रहे. यदि पेपर लीक एक व्यवस्थागत समस्या है, जो अलगअलग राज्यों और अलगअलग सरकारों के दौर में सामने आती रही है, तो इसका समाधान भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर खोजा जाना चाहिए.

यूपी में जहां 2017 से पहले की सरकारों ने प्रतियोगी परीक्षाओं को संगठित माफिया के हवाले कर दिया था और नियुक्तियों को भाईभतीजावाद तक सीमित कर रखा था, योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा विधेयक के जरिये इन अनियमितताओं को दूर करने का प्रयास किया, जिसके तहत कड़े कानूनी प्रावधान किए गए. इनमें एक करोड़ रुपये तक जुर्माना व उम्रकैद तक शामिल है. छात्रों का भविष्य सुरक्षित रखना, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बहाल करना, और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लाना. यह किसी एक दल की नहीं, बल्कि सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की साझा जिम्मेदारी है.

जब कोई सरकार पेपर लीक के मामलों में जांच एजेंसियों को सक्रिय करती है, दोषियों पर कार्रवाई करती है, और नई परीक्षा प्रणाली में सुधार के प्रस्ताव लाती है, तो इसे स्वीकार करने के बजाय केवल विरोध के लिए विरोध करना, समस्या के समाधान में बाधा ही उत्पन्न करता है. जनता यह अपेक्षा करती है कि जब कोई गंभीर मुद्दा सामने आए, तो सभी राजनीतिक दल मिलकर समाधान की दिशा में काम करें, न कि उसे चुनावी लाभ की दृष्टि से देखें.

लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा प्रश्न

पेपर लीक प्रकरण देश की शिक्षा व्यवस्था और लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है. इसे राजनीतिक क्रेडिट की लड़ाई में बदलना छात्रों के साथ अन्याय होगा. ज़रूरत इस बात की है कि परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, अधिक सुरक्षित और अधिक जवाबदेह बनाया जाए सभी राजनीतिक दलों की साझा प्रतिबद्धता के माध्यम से. जब तक यह मूल उद्देश्य राजनीतिक बयानबाज़ी के शोर में दब कर रह जाएगा, तब तक न तो छात्रों को न्याय मिलेगा और न ही व्यवस्था में कोई स्थायी सुधार संभव हो पाएगा. सपा और कांग्रेस को आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या वे वास्तव में छात्रों के भविष्य की चिंता में खड़े हैं, या केवल एक अवसर की तलाश में सड़कों पर उतरे हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *