RBI Polymer Notes Explained: प्लास्टिक नोट क्या हैं और क्यों भारत में कागजी नोटों की पूरी तरह नहीं होगी विदाई?

RBI Polymer Notes Explained: प्लास्टिक नोट क्या हैं और क्यों भारत में कागजी नोटों की पूरी तरह नहीं होगी विदाई?

भारत सरकार ने फील्ड ट्रायल के लिए ₹10 और ₹20 के RBI पॉलीमर नोट लाने के RBI के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. इससे एक दशक से भी पहले घोषित की गई योजना को फिर से शुरू किया जा रहा है. साथ ही, केंद्र सरकार ने साफ़ कर दिया है कि मौजूदा कागजी करेंसी RBI के प्लास्टिक नोटों से बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की मुद्रा मुद्रण शाखा ‘भारतीय रिजर्व बैंक नोट प्रिंटिंग लिमिटेड’ ने 10 और 20 रुपए मूल्यवर्ग के प्लास्टिक/पॉलीमर नोटों की छपाई के लिए टेंडर आमंत्रित किए हैं।

RBI Polymer Notes Explained: प्लास्टिक नोट क्या हैं और क्यों भारत में कागजी नोटों की पूरी तरह नहीं होगी विदाई?

हालांकि, इस खबर के सामने आते ही यह भ्रम भी फैला है कि क्या भारत में कागजी नोट हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे? सरकार और आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि कागजी नोट बंद करने का फिलहाल कोई प्लान नहीं है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि प्लास्टिक नोट क्या होते हैं, भारत में इनकी जरूरत क्यों पड़ी और क्यों कागजी नोटों की विदाई इतनी आसान नहीं है.

₹10 और ₹20 के दो अरब RBI प्लास्टिक नोट

यह फैसला भारतीय रिजर्व बैंक नोट प्रिंटिंग प्राइवेट लिमिटेड जो RBI की एक सहायक कंपनी है द्वारा टेंडर जारी करने के कुछ हफ़्ते बाद आया है. इस टेंडर से संकेत मिला था कि केंद्रीय बैंक RBI पॉलीमर नोटों के नए ट्रायल के साथ आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है. ऐसा ही एक प्रस्ताव लगभग 14 साल पहले भी घोषित किया गया था, लेकिन उस पर कभी अमल नहीं हो पाया था.

सोमवार को लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने कहा कि RBI ने अपने केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश पर फील्ड ट्रायल के लिए ₹10 और ₹20 के एकएक अरब RBI पॉलीमर नोट लाने का प्रस्ताव दिया था. अगर ट्रायल सफल रहे, तो इन्हें नियमित रूप से जारी किया जाएगा. उन्होंने कहा कि सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.

मंत्री के अनुसार, RBI ने सरकार को बताया है कि इंटरनेशनल स्टडीज से पता चलता है कि RBI पॉलीमर नोटों की उम्र पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में काफी ज़्यादा होती है, जिससे वे काफी ज्यादा टिकाऊ होते हैं.

क्या भारतीय प्लास्टिक नोट डिजिटल पेमेंट पर असर डालेंगे?

इस सवाल पर कि क्या RBI प्लास्टिक नोट डिजिटल पेमेंट पर असर डाल सकते हैं, चौधरी ने कहा कि प्रस्ताव अभी शुरुआती फेज में है और किसी भी असर का आकलन नियमित रूप से जारी होने के बाद ही किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि फिजिकल बैंकनोट और डिजिटल पेमेंट सिस्टम एकदूसरे के पूरक हैं और दोनों ही जनता के लिए उपलब्ध रहेंगे.

सरकार ने यह भी साफ किया कि RBI पॉलीमर नोट मौजूदा कागजी भारतीय मुद्रा के साथसाथ चलन में रहेंगे. सरकार ने कहा कि कागजी बैंक नोटों को पूरी तरह से पॉलीमरबेस्ड नोटों से बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है.

RBI प्लास्टिक नोट फिर से एजेंडे में क्यों हैं?

यह नई पहल BRBNMPL द्वारा हाल ही में जारी ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ के बाद शुरू हुई है. जुलाई में ही BRBNMPL ने बैंकनोट छापने के लिए उपयुक्त सुरक्षा सुविधाओं वाले ओपेसिफाइड पॉलीमर सब्सट्रेट के मेकर्स और सप्लायर्स से प्रतिस्पर्धी बोलियां आमंत्रित की थीं.

RBI की सहायक कंपनी ने कहा कि EOI में बताई गई जरूरत केवल तत्काल आवश्यकता के लिए थी. इसमें यह भी कहा गया है कि अगर RBI के पॉलिमर नोटों के फील्ड ट्रायल सफल रहते हैं, तो वह भविष्य में RFP या बाद के टेंडरों के जरिए अलगअलग मूल्यवर्ग के पॉलिमर सब्सट्रेट की बड़ी मात्रा हासिल करने का इरादा रखता है.

सरकार ने प्लास्टिक करेंसी नोटों के बारे में क्या कहा?

यह नया कदम 2012 में घोषित एक विचार को फिर से शुरू करने जैसा है. 13 दिसंबर, 2012 की प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो की विज्ञप्ति के अनुसार, RBI ने भारत सरकार के साथ मिलकर कई विकल्पों पर विचार किया था, जिसमें पॉलिमर सबस्ट्रेट पर बैंकनोट छापना भी शामिल था. उस समय, पांच शहरों में फील्ड ट्रायल के आधार पर 10 रुपए के एक अरब RBI पॉलिमर नोट लाने का फैसला किया गया था. PIB की विज्ञप्ति में यह भी स्पष्ट किया गया था कि पॉलिमर या प्लास्टिक नोट लाने का मुख्य उद्देश्य बैंक नोटों की उम्र बढ़ाना था, न कि नकली नोटों की समस्या से निपटना.

इसके बावजूद, दुनिया की पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत, ऑस्ट्रेलिया द्वारा पॉलिमर बैंकनोटों की पूरी सीरीज शुरू करने के लगभग तीन दशक बाद भी RBI के प्लास्टिक नोटों का मूल्यांकन कर रहा है. आज, लगभग 60 देश किसी न किसी रूप में पॉलिमर करेंसी का उपयोग करते हैं.

पॉलिमर नोट क्या हैं और भारतीय करेंसी से कैसे अलग हैं?

RBI के पॉलिमर नोट पारंपरिक बैंकनोट पेपर के बजाय नॉनफाइब्रस और नॉनपोरस पॉलिमर सबस्ट्रेट पर छापे जाते हैं.मौजूदा भारतीय करेंसी पूरी तरह से कपास के लंबे रेशों से बने कागज पर छापी जाती है, जो कॉटन कॉम्बर और लिंटर से प्राप्त होते हैं. इसका मतलब है कि कागजबेस्ड बैंकनोटों और पेड़ों की कटाई के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है. RBI के पॉलिमर नोट लाने का सबसे बड़ा कारण उनकी लंबी उम्र है, खासकर कम मूल्य वाले नोटों के लिए, जो बारबार हाथों में बदलते हैं और बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं.लंबी उम्र का मतलब है कम रिप्लेसमेंट, कम छपाई कॉस्ट और कम कचरा, साथ ही यह नकली नोटों को रोकने में भी मदद कर सकता है.

कौन से देश प्लास्टिक नोटों का उपयोग करते हैं?

ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और कनाडा जैसे देश पहले से ही टिकाऊ प्लास्टिक फिल्मों से बने पॉलिमर बैंकनोटों का उपयोग कर रहे हैं. ये नोट पारंपरिक कागज के बैंकनोटों की तुलना में बहुत लंबे समय तक चलते हैं और टूटफूट के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं, जिससे समय के साथ रिप्लेसमेंट की कॉस्ट कम करने में मदद मिलती है.

ऑस्ट्रेलिया 1988 में पॉलिमर बैंकनोट जारी करने वाला पहला देश बना. आज, 60 से अधिक देश प्लास्टिक करेंसी का उपयोग करते हैं. विकसित अर्थव्यवस्थाओं में, यूके, कनाडा और न्यूजीलैंड ने पॉलिमर नोट अपनाए हैं. भारत के करीब, थाईलैंड, वियतनाम, मलेशिया और सिंगापुर भी प्लास्टिक करेंसी का उपयोग करते हैं.

बैंक ऑफ कनाडा ने कागज और प्लास्टिक बैंकनोटों के प्रोडक्शन के पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन करने के बाद 2011 में पॉलिमर बैंकनोटों की ओर बढ़ना शुरू किया.

कैसे कम हो सकती है कॉस्ट?

RBI के पॉलीमर नोटों का सबसे बड़ा फायदा उनकी मजबूती है. नोट की कीमत के आधार पर, पॉलीमर नोट कागजी नोटों की तुलना में दो से छह गुना ज्यादा समय तक चल सकते हैं. कम कीमत वाले नोटों की उम्र आम तौर पर कम होती है क्योंकि वे ज़्यादा बार इस्तेमाल होते हैं.

ज़्यादा समय तक चलने का मतलब है कि एक तय समय में RBI को कम पॉलीमर नोट छापने होंगे. हालांकि, कागजी नोट की तुलना में हर पॉलीमर नोट को बनाने में ज्यादा खर्च आता है, लेकिन कम नोट बनाने, उन्हें लानेले जाने, प्रोसेस करने और आखिर में नष्ट करने की जरूरत पड़ती है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। समय के साथ, इससे करेंसी मैनेजमेंट की कुल कॉस्ट कम हो जाती है और पर्यावरण पर पड़ने वाला असर भी कम होता है.

कम छपाई की जरूरत के कारण, करेंसी छापने पर RBI का अपना खर्च लगभग 24 फीसदी घटकर वित्त वर्ष 2026 में 4,875 करोड़ रुपए हो गया. साथ ही, भारतीय करेंसी की मांग भी मजबूत बनी हुई है. RBI की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 के आखिर में चलन में मौजूद करेंसी की वैल्यू सालाना आधार पर 12 फीसदी बढ़कर 41.23 लाख करोड़ रुपए हो गई. चलन में 500 रुपए के नोटों का दबदबा बना हुआ है, जो चलन में मौजूद नोटों की कुल वैल्यू का 86 फीसदी हिस्सा हैं.

रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया की स्टडीज से पता चला है कि हालांकि पॉलीमर नोटों को बनाना ज्यादा महंगा होता है, क्योंकि पॉलीमर मटीरियल की कीमत कागज से ज्यादा होती है, लेकिन उनकी ज़्यादा उम्र के कारण उन्हें बदलने और प्रोसेस करने का खर्च कम हो जाता है, जिससे समय के साथ काफी सेविंग होती है.

इस पर IMF का क्या कहना है?

जून 2016 के एक लेख में, इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड ने कहा कि जो देश अपनी करेंसी के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंतित हैं, उन्हें पॉलिमर नोट अपनाने पर विचार करना चाहिए.

IMF के अनुसार कागज जल्दी ही दुनिया भर में पसंदीदा करेंसी बन गया और सदियों तक ऐसा ही रहा. लेकिन हाल के तकनीकी विकास के साथ, प्लास्टिक फिल्म नोट ज़्यादा सुरक्षा फीचर्स के साथसाथ लंबे समय तक चलने और ऊर्जा की बचत करने की क्षमता भी देते हैं.

इसमें कहा गया है कि लाइफसाइकिल असेसमेंट में कागज और पॉलिमर बैंकनोट दोनों के उत्पादन से जुड़े हर चरण की जांच की गई जिसमें बैंकनोट के कागज के लिए कपास उगाने या पॉलिमर नोट के लिए कच्चा माल बनाने से लेकर खराब हो चुकी करेंसी को नष्ट करने और ठिकाने लगाने तक की प्रक्रिया शामिल है.

IMF के अनुसार, पॉलिमर हर कैटेगरी में कागज से बेहतर साबित हुआ. इसने कहा कि कागज के नोटों की तुलना में पॉलिमर बैंकनोट ग्लोबल वार्मिंग की संभावना को 32 फीसदी और प्राथमिक ऊर्जा की मांग को 30 फीसदी कम करते हैं. इसने यह भी पाया कि पॉलिमर नोट कागज के बैंकनोटों की तुलना में दोगुने से भी ज़्यादा समय तक चलते हैं, जबकि ज़्यादा कीमत वाले नोट, जिनका इस्तेमाल कम होता है, और भी लंबे समय तक चलन में रहते हैं.

IMF ने आगे कहा कि क्योंकि करेंसी सीरीज के पूरे लाइफसाइल में कम RBI पॉलिमर नोट बनाने और बांटने की ज़रूरत होगी, इसलिए पर्यावरण पर कुल असर कम होता है. पॉलिमर बैंकनोट कागज के नोटों की तुलना में हल्के भी होते हैं, जिससे ट्रांसपोर्ट और डिस्ट्रीब्यूशन ज्यादा कुशल हो जाता है.

अपने जीवनकाल के अंत में, कागज के बैंकनोटों को आमतौर पर टुकड़ों में काटकर लैंडफिल में भेज दिया जाता है. वहीं, पॉलिमर नोटों को टुकड़ों में काटकर छर्रों में बदला जाता है और रोजमर्रा के प्लास्टिक प्रोडक्ट्स जैसे लॉन फर्नीचर में रीसाइकिल किया जाता है.

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