
मुरादाबाद, अमृत विचार: सावन में भगवान शिव के दर्शन पूजा के लिए शहर का प्राचीन व प्रसिद्ध श्री कामेश्वरनाथ बाबा शिव भक्तों की आस्था व भक्ति का केंद्र है। यहां सावन के महीने में स्थानीय ही नहीं दूर दराज के भक्त भी भोलेनाथ का दर्शन पूजन करने आते हैं। मान्यता है कि यहां उनके दर्शन व जलाभिषेक से भोलेनाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है। भोलेनाथ भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं।
सावन के महीने में यहां हर दिन यूं तो शिवभक्तों की बड़ी संख्या जुटती है। सावन में हर सोमवार को मंदिर सुबह चार बजे से लेकर रात 10:00 बजे तक लगातार खुला रहेगा। जिससे श्रद्धालु पूरे दिन बाबा का जलाभिषेक और दर्शन कर सकेंगे।
मंदिर के पुजारी विष्णु दत्त शर्मा ने बताया कि सावन में हर सोमवार को मंदिर सुबह चार बजे से रात 10:00 बजे तक लगातार खुला रहेगा। जबकि अन्य दिनों में मंदिर का समय सुबह 4:00 बजे से दोपहर 12 बजे तक और फिर शाम को 4:00 से रात 10:00 बजे तक रहेगा। उन्होंने बताया कि सावन के दौरान बड़ी संख्या में कांवड़ियों और शिवभक्तों के आगमन को देखते हुए दर्शन, जलाभिषेक और पूजाअर्चना की व्यवस्थाएं की गई हैं।
सावन के प्रत्येक सोमवार को प्रातकालीन मंगला आरती से लेकर रात्रि आरती तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। ऐसे में मंदिर समिति ने व्यवस्थाओं को सुचारु रखने के लिए स्वयंसेवकों की भी तैनाती की है। बताया कि सावन के सोमवार, महाशिवरात्रि और कांवड़ यात्रा के दौरान 84 घंटा मंदिर में विशेष जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और भव्य आरती की जाती है। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। मुरादाबाद ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर गंगाजल अर्पित करते हैं और भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
1762 ईस्वी में हुई थी मंदिर की स्थापना
स्थित श्री कामेश्वरनाथ बाबा मंदिर मुरादाबाद के सबसे प्राचीन शिवालयों में से एक है। मंदिर की स्थापना लगभग 1762 ईस्वी में मानी जाती है। समय के साथ मंदिर का पुनर्निर्माण एवं विस्तार कराया गया, जिसके बाद इसकी भव्यता और धार्मिक महत्व लगातार बढ़ता गया।
मंदिर का वास्तविक नाम श्री कामेश्वरनाथ बाबा मंदिर है, लेकिन यहां एक साथ 84 घंटों को टांगने की परंपरा के कारण यह पूरे देश में 84 घंटा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। मान्यता है कि भगवान शिव से सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु यहां घंटा चढ़ाते हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा मंदिर की सबसे बड़ी पहचान मानी जाती है।
नेपाल के राजा ने संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होने पर भेंट किया था अष्टधातु का घंटा
मंदिर के इतिहास के अनुसार वर्ष 1911 में नेपाल के राजा ने संतान प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण होने पर यहां एक विशाल अष्टधातु का घंटा भेंट किया था। वहीं काशी नरेश ने भी अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर लगभग सवा तीन मन वजनी घंटा मंदिर में अर्पित किया था। दोनों घंटे आज भी मंदिर की ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सुरक्षित हैं। मंदिर परिसर में स्थापित भगवान पशुपतिनाथ की प्रतिमा नेपाल और शिव परंपरा के धार्मिक संबंधों का प्रतीक मानी जाती है।