79 साल पहले जब देश आजाद हुआ तो सामने कई बड़ी चुनौतियां थीं. विभाजन का दर्द था. लाखों लोग विस्थापित हो चुके थे. खाद्यान्न की कमी थी. अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर थी. देश को नए सिरे से खड़ा करना था. यह बिना सहयोग के संभव नहीं था. प्रधानमंत्री नेहरू पहले तो देश में रहकर ही चुनौतियों का सामना करते रहे. लोगों को एकजुट करने की कोशिशों में लगे रहे. देश की तरक्की का खाका बनाते रहे. लगभग दो साल बाद उन्होंने पीएम के रूप में पहली विदेश यात्रा की. आइए, आजादी की वर्षगांठ के बहाने समझते हैं कि नेहरू ने पहली विदेश यात्रा के तहत किस देश का दौरा किया? यात्रा का उद्देश्य क्या था और इस यात्रा से हासिल क्या हुआ?

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विदेश नीति को बहुत महत्व दिया. आजाद भारत के प्रधानमंत्री के रूप में उनका पहला विदेश दौरा अमेरिका का था. नेहरू 11 अक्टूबर 1949 को वॉशिंगटन पहुंचे थे. इसके बाद उन्होंने अमेरिका के कई शहरों का दौरा किया. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। यात्रा के अगले चरण में वे कनाडा और आयरलैंड भी गए. इस दौरे को सद्भावना यात्रा यानी गुडविल टूर कहा गया. यह यात्रा केवल औपचारिक नहीं थी. इसका उद्देश्य भारत और अमेरिका के बीच नए संबंधों की नींव रखना था.
ऐतिहासिक समय पर हुआ था यह दौरा
नेहरू की अमेरिका यात्रा ऐसे समय हुई, जब दुनिया बदल रही थी. द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था. अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध शुरू हो गया था. दुनिया दो बड़े गुटों में बंट रही थी. एक गुट का नेतृत्व अमेरिका कर रहा था. दूसरा गुट सोवियत संघ के नेतृत्व में था. दोनों देश चाहते थे कि नए आजाद हुए देश उनके साथ जुड़ें. भारत ने इस दबाव को स्वीकार नहीं किया. नेहरू का मानना था कि भारत को किसी भी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं बनना चाहिए. भारत को अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रखनी चाहिए. इसी विचार से आगे चलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव पड़ी.
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू. फोटो: Getty Images
क्या था यात्रा का मुख्य मकसद?
नेहरू की अमेरिका यात्रा के कई उद्देश्य थे. दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध मजबूत करना था. दोनों देशों के बीच आपसी समझ अभी शुरुआती दौर में थी. नेहरू चाहते थे कि अमेरिकी जनता भारत को सही रूप में समझे. लंबे समय तक भारत ब्रिटिश शासन के अधीन रहा था. भारत की अर्थव्यवस्था कमजोर थी. फिर भी देश ने लोकतंत्र का रास्ता चुना था. नेहरू ने अपने भाषणों में भारत की स्वतंत्र सोच को स्पष्ट किया. उन्होंने कहा कि भारत अमेरिका के साथ सहयोग करना चाहता है. लेकिन भारत किसी सैन्य या राजनीतिक गुट में शामिल नहीं होगा.
दूसरा उद्देश्य आर्थिक सहायता प्राप्त करना था. आजादी के बाद भारत को खाद्यान्न की गंभीर समस्या थी. देश में अनाज का उत्पादन जरूरत के मुकाबले कम था. भारत को औद्योगिक विकास, कृषि सुधार और बुनियादी ढांचे के लिए भी सहायता चाहिए थी. नेहरू अमेरिका से आर्थिक मदद और खाद्यान्न सहयोग की उम्मीद कर रहे थे. शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना भी उनके मकसद का हिस्सा था. वे चाहते थे कि भारतीय विद्यार्थी और वैज्ञानिक अमेरिका के संस्थानों से सीखें.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने किया नेहरू का स्वागत
11 अक्टूबर 1949 को नेहरू वॉशिंगटन पहुंचे. अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने उनका स्वागत किया. यह भारत और अमेरिका के बीच पहला महत्वपूर्ण शीर्ष स्तर का संपर्क था. नेहरू ने अमेरिकी संसद के सदस्यों से मुलाकात की. उन्होंने शिक्षाविदों, उद्योगपतियों, किसानों और आम लोगों से भी बातचीत की. उन्होंने वॉशिंगटन, न्यूयॉर्क, शिकागो, मैडिसन और अन्य स्थानों का दौरा किया. नेहरू ने अमेरिकी विश्वविद्यालयों और औद्योगिक संस्थानों को देखा. उन्होंने अमेरिकी कृषि व्यवस्था का भी अध्ययन किया. अमेरिकी खेतों में मशीनों के इस्तेमाल ने उन्हें प्रभावित किया. वे यह समझना चाहते थे कि अमेरिका ने कृषि और उद्योग में इतनी प्रगति कैसे की. भारत में उस समय खेती काफी हद तक पारंपरिक साधनों पर निर्भर थी.
पंडित नेहरू और अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन, तस्वीर 1949 की है.
राष्ट्रपति ट्रूमैन से कई मुद्दों पर हुई बातचीत
नेहरू और राष्ट्रपति ट्रूमैन के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत हुई. दोनों नेताओं ने भारतअमेरिका संबंधों, एशिया की स्थिति और विश्व शांति पर चर्चा की. नेहरू ने स्पष्ट किया कि भारत अमेरिका का विरोधी नहीं है. भारत सहयोग के लिए तैयार है. लेकिन भारत अपनी विदेश नीति पर किसी का दबाव स्वीकार नहीं करेगा. उन्होंने शीत युद्ध में भारत की तटस्थ नीति का बचाव किया. उनका कहना था कि भारत हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे को अपने हित और विश्व शांति के आधार पर देखेगा. इस नीति से अमेरिका पूरी तरह संतुष्ट नहीं था. उस समय अमेरिका चाहता था कि भारत सोवियत संघ के खिलाफ उसके साथ खड़ा हो. भारत का गुटनिरपेक्ष रुख अमेरिकी रणनीति से अलग था.
खाद्यान्न सहायता पाना था खास मकसद
नेहरू की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक उद्देश्य खाद्यान्न सहायता प्राप्त करना था. भारत को गेहूं और अन्य अनाज की जरूरत थी. नेहरू ने अमेरिका से सहायता की उम्मीद की थी. लेकिन तत्काल बड़ी आर्थिक सहायता का वादा नहीं मिला. अमेरिका भारत की गुटनिरपेक्ष नीति से पूरी तरह सहमत नहीं था. इस कारण यात्रा का यह हिस्सा अपेक्षा के अनुसार सफल नहीं रहा. कुछ इतिहासकारों ने इसे नेहरू की कूटनीतिक असफलता माना. यात्रा के दौरान भारत को तत्काल बड़ी मदद नहीं मिली. लेकिन बातचीत का सिलसिला जारी रहा. करीब दो साल बाद अमेरिका और भारत के बीच गेहूं से जुड़ा ऋण समझौता हुआ. इसके तहत भारत को बड़ी मात्रा में गेहूं खरीदने में मदद मिली.
पंडित जवाहर लाल नेहरू. फोटो: INC
शिक्षा और तकनीक में मिला सहयोग
नेहरू की यात्रा का एक महत्वपूर्ण परिणाम शिक्षा के क्षेत्र में दिखाई दिया. उन्होंने अमेरिकी विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिक संस्थानों से संपर्क बढ़ाया. आगे चलकर भारत और अमेरिका के बीच तकनीकी सहयोग बढ़ा. इसी माहौल ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर की स्थापना में मदद हुई. इसमें अमेरिकी विश्वविद्यालयों का सक्रिय सहयोग रहा. नेहरू का मानना था कि भारत को केवल विदेशी सहायता पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. देश को अपने वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थान मजबूत करने होंगे. अमेरिका की यात्रा से उन्हें यह समझने में मदद मिली कि आधुनिक शिक्षा और शोध संस्थान देश के विकास में कितनी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.
क्या रहा यात्रा का राजनयिक परिणाम?
इस दौरे का सबसे बड़ा परिणाम भारत और अमेरिका के बीच बेहतर समझ का निर्माण था. दोनों देशों ने एकदूसरे की नीतियों को करीब से समझना शुरू किया. अमेरिका को यह पता चला कि भारत की गुटनिरपेक्षता किसी देश के खिलाफ नीति नहीं थी. यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का हिस्सा थी. भारत को भी यह समझ आया कि अमेरिका आर्थिक और तकनीकी रूप से बहुत शक्तिशाली देश है. लेकिन उसके साथ संबंध बनाते समय अपनी नीति और राष्ट्रीय हितों को स्पष्ट रखना जरूरी है. इस यात्रा ने भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को मजबूत किया. दुनिया ने देखा कि भारत नया आजाद देश होते हुए भी अपनी स्वतंत्र आवाज रखता है.
क्या यात्रा पूरी तरह सफल रही?
आर्थिक मदद के मामले में यात्रा तत्काल सफल नहीं रही. नेहरू अमेरिका से जिस स्तर की खाद्यान्न और आर्थिक सहायता चाहते थे, वह तुरंत नहीं मिली. शीत युद्ध के मुद्दे पर भी दोनों देशों के बीच मतभेद बने रहे. अमेरिका भारत की गुटनिरपेक्ष नीति से असहज था. लेकिन कूटनीतिक और राजनीतिक दृष्टि से यह यात्रा महत्वपूर्ण थी. इससे दोनों देशों के बीच सीधा संवाद शुरू हुआ. भारत की विदेश नीति दुनिया के सामने स्पष्ट हुई. शिक्षा, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं बनीं. आगे के वर्षों में भारत और अमेरिका के संबंधों में उतारचढ़ाव आते रहे. फिर भी 1949 की यात्रा को दोनों देशों के संबंधों की शुरुआती आधारशिला माना जा सकता है.
इस तरह स्पष्ट है कि पीएम के रूप में जवाहरलाल नेहरू का पहला विदेश दौरा अमेरिका का था. यह यात्रा अक्टूबर 1949 में हुई थी. इसका उद्देश्य भारत और अमेरिका के संबंधों को मजबूत करना, आर्थिक और खाद्यान्न सहायता प्राप्त करना तथा भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को स्पष्ट करना था. यात्रा के दौरान भारत को तत्काल बड़ी मदद नहीं मिली. फिर भी इसका महत्व कम नहीं था. इस दौरे ने भारत की विश्व मंच पर स्वतंत्र पहचान बनाई. नेहरू ने साफ संदेश दिया कि भारत सहयोग का विरोधी नहीं है. लेकिन वह किसी शक्ति गुट का हिस्सा भी नहीं बनेगा. यही सोच आगे चलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन का आधार बनी.