Quick Samachar: उत्तर प्रदेश का प्राचीन शहर कन्नौज केवल अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनूठी सुगंधित विरासत के लिए भी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। ‘भारत की इत्र राजधानी’ के नाम से मशहूर कन्नौज सदियों से पारंपरिक इत्र निर्माण का केंद्र रहा है। यहां तैयार होने वाली प्राकृतिक खुशबूओं ने मुगल दरबारों से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक अपनी खास पहचान बनाई है।
हजारों वर्षों पुराना इतिहास
प्राचीन काल में कन्नौज को ‘कन्यकुब्ज’ के नाम से जाना जाता था। यह कभी पंचाल साम्राज्य, आयुध वंश और बाद में कई शक्तिशाली राजवंशों की राजधानी रहा। छठी शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में यह शहर राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ। हालांकि आज कन्नौज की पहचान उसकी ऐतिहासिक धरोहर से कहीं अधिक उसकी सुगंधित संस्कृति के कारण है।
क्यों कहा जाता है ‘भारत की परफ्यूम कैपिटल’?
कन्नौज में 200 से अधिक इत्र डिस्टिलरी हैं, जहां पारंपरिक तरीके से इत्र बनाया जाता है। यहां के इत्र को 2014 में जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग मिला, जिससे इसकी प्रामाणिकता और विरासत को कानूनी संरक्षण प्राप्त हुआ। कन्नौज का इत्र पूरी तरह प्राकृतिक तत्वों से तैयार किया जाता है। गुलाब, चमेली, मोगरा, केवड़ा, खस, केसर, कस्तूरी और कपूर जैसी सुगंधित सामग्री इसके निर्माण में उपयोग की जाती है।
400 साल पुरानी देगभापका तकनीक
कन्नौज के इत्र निर्माण की सबसे खास बात इसकी पारंपरिक ‘देगभापका’ तकनीक है। इस प्रक्रिया में तांबे के बड़े बर्तन और भाप संग्रह करने वाले पात्र इस्तेमाल किए जाते हैं। फूलों और प्राकृतिक सामग्री को पानी के साथ देग में गर्म किया जाता है। भाप के साथ निकलने वाली सुगंध को इकट्ठा कर चंदन के तेल में मिलाया जाता है, जिससे इत्र तैयार होता है। यह कला पीढ़ीदरपीढ़ी हस्तांतरित होती रही है। कई परिवार पिछले 300 वर्षों से इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।
मिट्टी की खुशबू वाला अनोखा इत्र
कन्नौज का सबसे अनोखा उत्पाद ‘मिट्टी इत्र’ है। इसे विशेष रूप से पकाई गई दोमट मिट्टी से बनाया जाता है। इसकी खुशबू पहली बारिश के बाद मिट्टी से उठने वाली सौंधी महक यानी पेट्रिकोर की याद दिलाती है। इसके अलावा शमामा इत्र भी काफी प्रसिद्ध है, जिसे 40 से अधिक फूलों, जड़ीबूटियों और रेजिन के मिश्रण से तैयार किया जाता है। इसे बनने और तैयार होने में कई महीने लग जाते हैं।
मुगल काल से जुड़ा है गहरा रिश्ता
कन्नौज के इत्र उद्योग को मुगल काल में खास प्रोत्साहन मिला। माना जाता है कि मुगल सम्राट जहांगीर की पत्नी नूरजहां कन्नौज के गुलाबों की खुशबू से इतनी प्रभावित हुईं कि गुलाब इत्र की मांग तेजी से बढ़ गई। मुगल शासक अपने शरीर, वस्त्रों, महलों और यहां तक कि भोजन में भी इत्र का इस्तेमाल करते थे। उस दौर में कन्नौज के इत्र की मांग पूरे साम्राज्य में फैल गई। सम्राट अकबर के शासनकाल में तो सुगंध और इत्र के लिए अलग विभाग तक स्थापित था।
दुनिया भर में पहुंचती है कन्नौज की खुशबू
आज कन्नौज में बनने वाले इत्र और गुलाब जल का निर्यात मध्य पूर्व, यूरोप, अमेरिका, मध्य एशिया और ओशिनिया तक किया जाता है। लगभग 20 से अधिक कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कन्नौज के इत्र का निर्यात करती हैं। यूरोप के कई प्रतिष्ठित परफ्यूम हाउस भी कन्नौज के गुलाब, चमेली और खस के इत्र का उपयोग आधुनिक परफ्यूम तैयार करने में करते हैं।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ी चुनौती
हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन कन्नौज के इत्र उद्योग के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। फूलों के खिलने का समय अनिश्चित होने से कच्चे माल की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। इसके अलावा महंगे चंदन तेल, सिंथेटिक परफ्यूम की बढ़ती लोकप्रियता और बदलती उपभोक्ता पसंद ने भी इस पारंपरिक उद्योग पर दबाव बढ़ाया है।
आज भी जिंदा है खुशबुओं की विरासत
कठिनाइयों के बावजूद कन्नौज के हजारों परिवार आज भी इत्र निर्माण से जुड़े हुए हैं। कई कारीगरों के परिवारों में यह कला 20 से 30 पीढ़ियों से चली आ रही है। कन्नौज की तंग गलियों में स्थित इत्र की दुकानों में आज भी कांच की सुंदर शीशियों में भरे इत्र पुराने समय की खुशबुओं को संजोए हुए हैं। यही कारण है कि कन्नौज को भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे प्राचीन और जीवित परफ्यूम परंपराओं में से एक माना जाता है।
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