उत्तर प्रदेश के दो मुस्लिम नेताओं ने बनाई दो यूनिवर्सिटी, दोनों अंधकार में…

उत्तर प्रदेश के दो मुस्लिम नेताओं ने बनाई दो यूनिवर्सिटी, दोनों अंधकार में…

उत्तर प्रदेश के दो मुस्लिम नेताओं ने दो यूनिवर्सिटी बनाई लेकिन नाम कमाने से पहले ही दोनों दागदार हो गईं. रामपुर में पूर्व मंत्री और सपा नेता आजम खान ने मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी का निर्माण कराया. 2017 में जैसी ही सपा सत्ता से बाहर हुई, आजम खान के साथसाथ इस यूनिवर्सिटी के भी बुरे दिन शुरू हो गए. आज नौबत यहां तक आ गई कि रामपुर विकास प्राधिकरण ने यूनिवर्सिटी की 40 में से 38 इमारतों को तोड़ने का आदेश जारी कर दिया है. कारण बताया गया है कि ये बिल्डिंग नक्शा पास किए बिना बनाई गईं. ऐसी ही एक आलीशान यूनिवर्सिटी रामपुर से 300 किलोमीटर दूर सहारनपुर में पूर्व बसपा एमएलसी हाजी इकबाल ने बनवाई. ये यूनिवर्सिटी पूरी तरह अपने वजूद में आ भी नहीं पाई थी कि पुलिसईडी की जांच के दायरे में आकर दम तोड़ने लगी. हालांकि, ये दोनों यूनिवर्सिटी फंक्शनल हैं लेकिन इनपर कानून का शिकंजा इतना कस चुका है कि भविष्य पूरी तरह अंधकार में है.

उत्तर प्रदेश के दो मुस्लिम नेताओं ने बनाई दो यूनिवर्सिटी, दोनों अंधकार में…

आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी कब बनी?

मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की स्थापना साल 2006 में उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल के एक अधिनियम के तहत की गई थी. यूनिवर्सिटी की साइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, इसका परिसर 250 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला है. यहां बैडमिंटन, शतरंज, कैरम, टेबल टेनिस जैसे इनडोर खेलों और फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, लॉन टेनिस, वॉलीबॉल, घुड़सवारी, रस्साकशी, पोल वॉल्ट जैसे आउटडोर खेलों की सुविधाओं से लैस ग्राउंड हैं. साल 2012 में तत्कालीन राज्यपाल अजीज कुरैशी ने यूनिवर्सिटी को माइनॉरिटी का स्टेटस दिया. इससे जुड़ा बिल मायावती के राज में करीब 5 साल तक लटका रहा. हालांकि, अजीज कुरैशी उत्तराखंड के राज्यपाल थे लेकिन महज 2 महीने के लिए उन्हें यूपी के राज्यपाल का अतिरिक्त चार्ज मिला और उसी दौरान उन्होंने ये बिल पास कर दिया. बाद में वो मिजोरम के राज्यपाल बने. 30 जुलाई 2012 से यूनिवर्सिटी का एकेडमिक सेशन शुरू हुआ. मुख्यमंत्री बनने के कुछ महीनों बाद ही 18 सितंबर 2012 को अखिलेश यादव ने यूनिवर्सिटी का उद्घाटन किया. सपा सरकार में आजम खान की तूती बोल रही थी. साथसाथ यूनिवर्सिटी और उसके आसपास का इलाका भी फलताफूलता रहा.

योगी सरकार आने के बाद बुरे दिन

यूं तो आजम खान हर चुनाव में भाजपा नेताओं के निशाने पर रहते थे. लेकिन यूपी में जब लंबे समय बाद भाजपा की वापसी हुई और योगी आदित्यनाथ को सीएम की कुर्सी मिली , तब से मानो आजम खान के बुरे दिन शुरू हो गए. रामपुर में ऐसे अधिकारियों को चार्ज मिलने लगा जो सीधे आजम खान को चैलेंज करते थे. इलाके के लोगों ने यूनिवर्सिटी के लिए जमीन हड़पने के मुकदमे कराने शुरू कर दिए. एफआईआर होती रहीं, आजम खान और उनका परिवार अर्श से फर्श तक पहुंच गया. पूरा परिवार जेल चला गया. एक मामले में बेटे की विधायकी गई, पत्नी को जेल जाना पड़ा, आजम खान मीडिया के सामने रोरोकर अपने ऊपर जुल्म होने की दास्तां सुनाते रहे. लेकिन यूपी सरकार और प्रशासन की कार्रवाई आजम खान पर रुक नहीं रही हैं. 2026 की शुरुआत में आजम खान और उनका परिवार औपचारिक रूप से ट्रस्ट से अलग हो गए थे.

जौहर यूनिवर्सिटी पर अब क्या कार्रवाई हो रही?

रामपुर के जिलाधिकारी अजय कुमार द्विवेदी ने बताया कि यूनिवर्सिटी परिसर में बिना अनुमति किए गए निर्माण के संबंध में क्षेत्रीय जूनियर इंजीनियर की रिपोर्ट मिलने के बाद यह कार्रवाई शुरू की गई. उन्होंने बताया कि मैनेजमेंट को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया था, इसके बाद संस्थान ने 8 जुलाई को अपना जवाब दाखिल किया. 15 जुलाई को मामले की सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान यूनिवर्सिटी की तरफ से तर्क दिया गया कि यूनिवर्सिटी सिंगनखेड़ा गांव में स्थित है, जो 27 सितंबर 2024 से पहले रामपुर विकास प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था, इसलिए आरडीए से निर्माण की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं थी. यूनिवर्सिटी ने ये भी कहा कि ज्यादातर इमारतों का निर्माण काफी पहले हो चुका था, इसलिए मौजूदा नियमों के आधार पर उन्हें अवैध नहीं ठहराया जा सकता. रामपुर विकास प्राधिकरण ने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए कहानिर्माण के समय सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेना अनिवार्य था, चाहे बाद में उस क्षेत्र को विकास प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में शामिल किया गया हो या नहीं. प्राधिकरण के आदेश के अनुसार, रामपुर जिला पंचायत के रिकॉर्ड से पता चलता है कि केवल मेडिकल कॉलेज बिल्डिंग और अकादमिक बिल्डिंग के नक्शे को ही मंजूरी मिली थी जबकि बाकी 38 इमारतों के लिए कोई वैध अनुमति नहीं ली गई थी. जौहर यूनिवर्सिटी अभी बुलडोजर नहीं चला है लेकिन उसके परिसर से गुजरने वाली सड़क को पीडब्ल्यूडी ने ‘आम रास्ता’ घोषित कर दिया है. यूनिवर्सिटी के मेन गेट पर ‘साइन बोर्ड’ लगा दिया है कि यह सड़क आम जनता के लिए खुली है. यह तीन किलोमीटर लंबी सड़की है, जिसे अखिलेश यादव के कार्यकाल में 201617 में पीडब्ल्यूडी ने लगभग 17.16 करोड़ रुपये की लागत से बनवाया था. यूनिवर्सिटी प्रशासन ने 2019 में गेट बंद कर दिया था, जिससे रास्ते पर आनाजाना बंद हो गया था.

सहारनपुर की ग्लोकल यूनिवर्सिटी निशाने पर

ग्लोकल यूनिवर्सिटी सहारनपुर जिले के मिर्जापुर में 2012 में बनाई गई. सहारनपुर यूपी का सीमाई जिला है. ये यूनिवर्सिटी उत्तराखंड और हरियाणा के बॉर्डर से जुड़े क्षेत्र में है. 350 एकड़ से ज्यादा जमीन पर बनी इस यूनिवर्सिटी को वर्ल्ड क्लास बनाया गया है. ये यूनिवर्सिटी उत्तर प्रदेश यूनिवर्सिटी एक्ट के तहत ही स्थापित की गई. यूजीपी से मान्यता प्राप्त भी है लेकिन इसे बनाने वाले मोहम्मद इकबाल का किरदार दागदार बताया जाता है. योगी सरकार के दौरान अच्छे दिन नहीं आ सके. मायावती के करीबी माने जाने वाले हाजी इकबाल 2009 से 2015 तक यूपी विधानपरिषद के सदस्य रहे. इसी दौरान उन्होंने इस यूनिवर्सिटी को भी खड़ा कर लिया. लेकिन योगी राज आने के बाद जैसेजैसे समय बीतता गया, हाजी इकबाल और उनकी संपत्ति जांच एजेंसियों के रडार पर आने लगे.

पूर्व MLC इकबाल पर क्यों लिया गया एक्शन?

हाजी इकबाल कभी परचून की दुकान चलाते थे. उन्होंने शहद बेचने का भी काम किया. उनके क्षेत्र उत्तराखंड के पहाड़ों से जुड़ा है. वहां छोटेछोटे नालेनदियां हैं. बालू का खनन यहां खूब होता है. हाजी इकबाल भी इसी पानी में कूद पड़े और इतना रेत निकाला कि गरीबी का साया भी उनसे दूर चला गया. पैसा हो गया तो समाज में उठबैठ भी बढ़ गई. राजनीति में आ गए और जब बसपा सरकार बनी तो उनसे जुड़ गए. एमएलसी बन गए लेकिन उनके नाम पर अवैध खनन का जो दाग था वो सरकार बदलते ही नासूर बन गया. हाजी इकबाल और उनके करीबियों पर सहारनपुर समेत अन्य जगह 50 से ज्यादा क्रिमिनल केस दर्ज किए गए. 2022 में उनके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत केस किया गया. गिरफ्तारी का डर देख हाजी इकबाल दुबई फरार हो गए. इधर उनकी संपत्तियों और परिवार पर प्रशासन कार्रवाई करता रहा. बेटे समेत परिवार के कुछ लोग जेल भेजे गए. वहीं, ईडी ने अवैध खनने केस में एक्शन लेते हुए 2024 में यूनिवर्सिटी की 121 एकड़ जमीन और बिल्डिंग कुर्क कर ली. इसकी कीमत करीब 4440 करोड़ बताई गई. यूनिवर्सिटी अब्दुल वहीद एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट चलाती है जो इकबाल के बेटे के नाम पर है. आरोप ये थे कि अवैध खनन से कमाया गया धन ट्रस्ट के नाम पर ट्रांसफर किया गया. फिर उस पैसे का इस्तेमाल यूनिवर्सिटी के लिए जमीन खरीदने और यूनिवर्सिटी बनाने के लिए किया गया.

कुल मिलाकर ग्लोकल यूनिवर्सिटी अभी चल जरूर रही है, लेकिन महज नाम के लिए. उसका अस्तित्व कब रेत की तरह बिखर गए, कोई नहीं कह सकता. ऐसा ही हाल जौहर यूनिवर्सिटी का नजर आता है. आजम खान ने जो सपना देखा था वो यूपी सरकार के बुलडोजर तले दफन होता नजर आ रहा है.

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