जुझारू नेता ममता बनर्जी द्वारा स्थापित टीएमसी का नाम और चुनाव चिन्ह फ्रीज़ करते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने दोनों गुटों को अलगअलग नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित किए हैं. एक गुट को फुटबॉल खिलाड़ी का चिन्ह और दूसरे गुट को लिफाफे का चिन्ह दिए जाने की जानकारी सामने आई है. अंतिम फैसला बाद में होना है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। अब पुराने नाम और चुनाव चिन्ह का फैसला बाद में पूरी सुनवाई, तथ्यों को देखने के बाद आएगा. आइए, इसी बहाने जानते हैं कि देश की कितनी राजनीतिक पार्टियां टूटीं, नाम के साथ चुनाव चिन्ह भी बदले, क्यों हुई दोफाड़?

भारतीय राजनीति में पार्टियों का टूटना कोई नई बात नहीं है. कई बार विचारधारा के मतभेद से दल अलग हुए. कई बार नेतृत्व की लड़ाई ने पार्टी को बांट दिया. कुछ मामलों में चुनावी हार के बाद विवाद बढ़ा. पार्टी टूटने के बाद सबसे बड़ा सवाल नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर उठता है. चुनाव चिन्ह किसी भी दल की पहचान होता है. ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में मतदाता पार्टी के नाम से ज्यादा उसके निशान को याद रखते हैं. इसलिए चुनाव चिन्ह पर अधिकार की लड़ाई राजनीतिक संघर्ष का अहम हिस्सा बन जाती है.
कांग्रेस में 1969 की ऐतिहासिक टूट
कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टियों में से एक है. साल 1969 में पार्टी के भीतर बड़ा संघर्ष हुआ. यह विवाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस संगठन के पुराने नेताओं के बीच था. राष्ट्रपति चुनाव को लेकर मतभेद खुलकर सामने आया. इंदिरा गांधी ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के बजाय वीवी गिरि का समर्थन किया. इसके बाद कांग्रेस दो गुटों में बंट गई. एक गुट को कांग्रेस संगठन के पुराने नेताओं का समर्थन मिला. इसे कांग्रेस ओ के नाम से जाना गया. इंदिरा गांधी का गुट कांग्रेस आर कहलाया. उस समय कांग्रेस का पुराना चुनाव चिन्ह बैलों की जोड़ी था. विवाद के बाद यह चिन्ह किसी एक गुट को नहीं दिया गया. इंदिरा गांधी गुट को गाय और बछड़ा चुनाव चिन्ह मिला. बाद में इसी गुट ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई. साल 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को बड़ी सफलता मिली.
कांग्रेस.
कांग्रेस का विकल्प बनने को जुटे लेकिन खंडखंड हो गए
जनता दल का गठन कई विपक्षी दलों के एक साथ आने से हुआ था. इसका उद्देश्य कांग्रेस के सामने एक मजबूत विकल्प खड़ा करना था. लेकिन समय के साथ पार्टी के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर मतभेद बढ़ने लगे. साल 1999 के आसपास जनता दल में बड़ी टूट हुई. अलगअलग नेताओं ने अपने गुट बनाए. इसके बाद जनता दल का चक्र वाला चुनाव चिन्ह विवाद में आ गया. जनता दल यूनाइटेड को तीर का चुनाव चिन्ह मिला. जनता दल सेक्युलर को अलग पहचान के साथ चुनावी मैदान में उतरना पड़ा. पार्टी के बिखराव का असर उसके संगठन और जनाधार पर भी पड़ा. यह मामला दिखाता है कि गठबंधन से बनी पार्टियों में वैचारिक मतभेद लंबे समय तक छिपे नहीं रह सकते. जब नेतृत्व को लेकर सहमति खत्म होती है, तो संगठन टूटने लगता है.
AIADMK.
AIADMK और दो पत्ती का विवाद
तमिलनाडु की AIADMK में भी चुनाव चिन्ह को लेकर दो बार बड़ा विवाद हुआ. पहली बड़ी टूट साल 1989 में एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद हुई. जयललिता और जानकी रामचंद्रन के गुट आमनेसामने आ गए. दोनों पक्षों ने पार्टी और दो पत्ती वाले चुनाव चिन्ह पर दावा किया. चुनाव आयोग ने उस समय दो पत्ती वाला चिन्ह रोक दिया. दोनों गुटों को अलग चुनाव चिन्ह के साथ चुनाव लड़ना पड़ा. बाद में जयललिता का गुट मजबूत होकर उभरा.
उन्हें पार्टी का नेतृत्व मिला और दो पत्ती वाला चिन्ह भी वापस हासिल हुआ. साल 2017 में AIADMK में एक बार फिर विवाद हुआ. शशिकला और ओ पन्नीरसेल्वम के गुट आमनेसामने थे. इस बार भी दो पत्ती वाले चिन्ह पर रोक लगाई गई. एआईएडीएमके का इतिहास बताता है कि लोकप्रिय चुनाव चिन्ह पार्टी की राजनीतिक ताकत बन सकता है. लेकिन केवल चिन्ह के भरोसे संगठन नहीं चलाया जा सकता.
चिराग पासवान के गुट को लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास नाम मिला.
लोक जनशक्ति पार्टी को लेकर चाचाभतीजे भिड़े
लोक जनशक्ति पार्टी में रामविलास पासवान के निधन के बाद नेतृत्व का विवाद गहरा गया. उनके बेटे चिराग पासवान और भाई पशुपति कुमार पारस के गुट आमनेसामने आ गए. दोनों पक्षों ने खुद को असली लोक जनशक्ति पार्टी बताया. विवाद बढ़ने पर चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और बंगला चुनाव चिन्ह फ्रीज कर दिया. इसके बाद दोनों गुटों को अलग नाम और चुनाव चिन्ह दिए गए. चिराग पासवान के गुट को लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास नाम मिला. यह घटना परिवार आधारित दलों में उत्तराधिकार के संकट को दिखाती है. जब किसी पार्टी का संगठन एक परिवार या एक नेता के इर्दगिर्द केंद्रित होता है, तब नेतृत्व परिवर्तन के समय विवाद की संभावना बढ़ जाती है.
शिवसेना भी दो हिस्साें में बंटी थी.
शिवसेना में उद्धव और शिंदे गुट
महाराष्ट्र की शिवसेना में साल 2022 में बड़ा राजनीतिक संकट पैदा हुआ. एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में कई विधायक उद्धव ठाकरे के खिलाफ हो गए. इसके बाद महाराष्ट्र की तत्कालीन सरकार पर संकट आ गया. दोनों गुटों ने शिवसेना और धनुषबाण चुनाव चिन्ह पर दावा किया. चुनाव आयोग ने पहले इस नाम और चिन्ह को अस्थायी रूप से रोक दिया. बाद में चुनाव आयोग ने शिवसेना नाम और धनुषबाण चिन्ह एकनाथ शिंदे के गुट को दिया.
उद्धव ठाकरे गुट को शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे नाम मिला. उसे मशाल चुनाव चिन्ह दिया गया. इस विवाद ने यह सवाल भी उठाया कि पार्टी का असली मालिक कौन होता है. केवल विधायक और सांसदों की संख्या ही पर्याप्त है या संगठन और पार्टी संविधान भी महत्वपूर्ण हैं. शिवसेना उद्धव गुट हाल ही में फिर एक बार टूटी लेकिन चुनाव चिन्ह पर कोई असर नहीं पड़ा क्योंकि उद्धव गुट के तीन चौथाई लोकसभा सदस्य शिंदे गुट के साथ चले गए.
NCP में नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद खड़ा हुआ था.
NCP में शरद और अजित पवार आमनेसामने
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी में भी नेतृत्व को लेकर बड़ा विवाद हुआ. अजित पवार के गुट ने अलग राजनीतिक रास्ता अपनाया. शरद पवार का गुट पार्टी के मूल नाम और घड़ी चुनाव चिन्ह पर अपना दावा करता रहा. चुनाव आयोग के सामने दोनों पक्षों ने दस्तावेज और समर्थन का दावा पेश किया. इसके बाद नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद खड़ा हुआ. फरवरी 2024 में चुनाव आयोग ने अजित पवार गुट को असली एनसीपी माना था. इसके बाद पार्टी का मूल नाम और घड़ी वाला चुनाव चिन्ह अजित पवार गुट को आवंटित किया गया. शरद पवार गुट को अलग नाम राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टीशरदचंद्र पवार दिया गया. तुरही बजाता हुआ आदमी चुनाव चिन्ह मिला.
आखिर पार्टियां क्यों टूटती हैं?
पार्टियों में टूट के कई कारण होते हैं. सबसे बड़ा कारण नेतृत्व की महत्वाकांक्षा होती है. इसके अलावा मुख्यमंत्री या पार्टी अध्यक्ष बनने की होड़ भी विवाद बढ़ाती है. टिकट बंटवारे को लेकर नाराजगी भी टूट का कारण बनती है. कई बार विचारधारा और गठबंधन की रणनीति पर मतभेद पैदा होते हैं. कुछ मामलों में परिवार के भीतर सत्ता संघर्ष पार्टी को बांट देता है. विधायकों और सांसदों की संख्या भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. जिस गुट के पास अधिक निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं, वह खुद को असली पार्टी साबित करने की कोशिश करता है. सांसदोंविधायकों के नंबर के आधार पर ही टीएमसी का बागी गुट उभरा तो जगजाहिर सच है कि शरद पवार ने एनसीपी बनाई. भतीजे अजित पवार ने उनकी गोद में बैठकर राजनीति सीखी लेकिन जैसे ही मौका मिला वे पार्टी तोड़कर अलग गुट बना लिए.
इस तरह कहा जा सकता है कि टीएमसी की टूट न पहली बार हुई है और न ही यह अंतिम टूट है. यह सिलसिला आगे भी चलेगा. इससे पहले कांग्रेस, जनता दल, एआईएडीएमके, लोक जनशक्ति पार्टी, शिवसेना और एनसीपी जैसे दलों में बड़ी टूट देश ने देखा है. इन सभी मामलों में नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद हुआ. चुनाव चिन्ह केवल एक तस्वीर नहीं होता. यह पार्टी की पहचान, इतिहास और मतदाताओं के भरोसे से जुड़ा होता है. लेकिन अंतिम ताकत संगठन और जनता के समर्थन से आती है. जिस गुट के पास मजबूत संगठन, लोकप्रिय नेतृत्व और जनता का भरोसा होता है, वह नया नाम और नया चिन्ह मिलने के बाद भी आगे बढ़ सकता है. टीएमसी विवाद का अंतिम परिणाम भी इसी बात पर निर्भर करेगा.