क्या भारत में मुगल लेकर आए शतरंज, किस बादशाह ने बनवाया पच्चीसी बोर्ड?

क्या भारत में मुगल लेकर आए शतरंज, किस बादशाह ने बनवाया पच्चीसी बोर्ड?

पूरी दुनिया में विश्व शतरंज दिवस हर साल 20 जुलाई को मनाया जाता है. यह अंतर्राष्ट्रीय शतरंज महासंघ की स्थापना की याद में मनाया जाता है. महासंघ की स्थापना 102 साल पहले 20 जुलाई 1924 को हुई थी. यह दिन पहली दफा साल 1966 में मनाया गया. इस दिन को मनाने का प्रस्ताव यूनेस्को ने पहली दफा रखा. साल 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी सर्वसम्मति से इस दिन को आधिकारिक मान्यता दी. आइए, इस खास दिन के बहाने यह भी जानते हैं कि आज का लोकप्रिय खेल शतरंज मुगल काल में किस रूप में प्रचलित था? क्या उस जमाने में चेस खेला जाता था?

क्या भारत में मुगल लेकर आए शतरंज, किस बादशाह ने बनवाया पच्चीसी बोर्ड?

मुगलों के दौर में केवल आज की आधुनिक शतरंज जैसी बिसात ही लोकप्रिय नहीं थी. उस समय शतरंज, चतुरंग, चौपड़, चौसर और पच्चीसी जैसे कई रणनीतिक खेल प्रचलित थे. इनमें शतरंज बुद्धि और युद्धकौशल का खेल था. चौपड़ और पच्चीसी मनोरंजन, प्रतिस्पर्धा और कभीकभी दांव के खेल भी थे. मुगल दरबारों में खेल सिर्फ समय काटने का साधन नहीं थे. वे शाही जीवन, सैनिक सोच, सामाजिक मेलजोल और प्रतिष्ठा का हिस्सा थे.

शतरंज की जड़ें भारत और फारस में

शतरंज का पुराना संबंध भारत के खेल चतुरंग से जोड़ा जाता है. चतुरंग का अर्थ है सेना के चार अंग. इनमें पैदल सैनिक, घोड़े, हाथी और रथ शामिल थे. यह संरचना पुराने भारतीय युद्धदलों जैसी थी. समय के साथ यह खेल पश्चिम की ओर गया. फारस में इसे शतरंज या शतरंज़ कहा जाने लगा. अरबी दुनिया में भी यह लोकप्रिय हुआ. फिर यह यूरोप पहुंचा. मुगल शासक मध्य एशियाई और तैमूरी परंपरा से आए थे. उनका फारसी भाषा, साहित्य, कला और दरबारी संस्कृति से गहरा संबंध था. इसलिए शतरंज उनके लिए अपरिचित खेल नहीं था. भारत आने के बाद उन्हें यहां की पुरानी खेलपरंपराएं भी मिलीं. इस प्रकार मुगलकाल में भारतीय और फारसी खेलसंस्कृतियों का मेल दिखाई देता है.

मुगलों के दौर में शतरंज खेलने की परंपरा थी.

शतरंज और चौपड़ एक ही खेल नहीं थे

इतिहास की चर्चा में अक्सर शतरंज और चौपड़ को एक जैसा मान लिया जाता है. यह सही नहीं है. शतरंज दो खिलाड़ियों का रणनीतिक खेल था. इसमें राजा, मंत्री या वज़ीर, घोड़े, हाथी और पैदल जैसे मोहरे होते थे. इसका लक्ष्य प्रतिद्वंद्वी के राजा को घेरना था. चौपड़ या चौसर अलग खेल था. यह कपड़े या जमीन पर बने क्रॉस जैसे बोर्ड पर खेला जाता था. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इसमें गोटियां और पासे या कौड़ियां इस्तेमाल होती थीं. इसमें दो या चार खिलाड़ी भाग ले सकते थे.

मुगलकाल के लिखित प्रमाण चौपड़ और पच्चीसी के बारे में अपेक्षाकृत अधिक मिलते हैं. इसलिए यह कहना ज्यादा बेहतर इतिहास होगा कि मुगल दरबारों में रणनीतिक बोर्ड गेम की मजबूत परंपरा थी. शतरंज उसका एक हिस्सा था. चौपड़ और पच्चीसी भी बहुत महत्वपूर्ण थे.

मुगल बादशाह अकबर. फोटो: Getty Images

अकबर के दौर में खेलों का विशेष स्थान

मुगल बादशाह अकबर का शासन साल 1556 से साल 1605 तक रहा. उस समय में दरबार बहुत सक्रिय था. कला, संगीत, शिकार, कुश्ती, घुड़सवारी और खेलों को महत्व दिया जाता था. अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने आइनएअकबरी में शाही व्यवस्था, रस्मों और मनोरंजन की जानकारी दी है. इस ग्रंथ में चौपड़ जैसे खेलों का उल्लेख मिलता है. राजपूतों की खेलकुशलता की भी चर्चा आती है.

अकबर के समय फतेहपुर सीकरी में विशाल पच्चीसीबोर्ड का उदाहरण प्रसिद्ध है. यहां बड़े आकार का खेलस्थल बना था. परंपरा के अनुसार, इसमें मनुष्यों को गोटियों की तरह खड़ा किया जाता था. यह दृश्य बताता है कि शाही वर्ग खेलों को भव्य आयोजन में बदल सकता था. यह केवल निजी मनोरंजन नहीं था. इसमें दरबार की शक्ति, वैभव और अनुशासन भी दिखता था.

क्या अकबर शतरंज खेलता था?

अकबर को शतरंज या चौपड़ का बहुत शौकीन बताया जाता है. चौपड़ और पच्चीसी के प्रमाण अधिक स्पष्ट हैं. आधुनिक शतरंज के समान खेल को लेकर हर दावे के लिए समान स्तर के प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलते. इसलिए सही बात यह है कि अकबर के युग में शतरंज की परंपरा मौजूद थी और दरबार में रणनीतिक खेलों का सम्मान था. पर, किसी विशेष बादशाह की हर रोज की शतरंजबाज़ी को बिना ठोस स्रोत के निश्चित तथ्य नहीं कहना चाहिए.

इतिहास में चौपड़ और शतरंज को एक मान लिया जाता है, लेकिन ये अलगअलग हैं.

मुगल समाज में खेलों की भूमिका

मुगलकालीन खेलों का समाज में अलग स्थान था. अमीर लोग अपने घरों, बागों, महलों और दरबारों में खेलते थे. सैनिक और अधिकारी भी बुद्धि तथा योजना वाले खेलों में रुचि रखते थे. शतरंज को युद्ध की कल्पना से जोड़ा जाता था. राजा की रक्षा करना, मोहरों की चाल समझना और प्रतिद्वंद्वी को घेरना इसमें जरूरी था. इस कारण यह खेल शासन और सेना की दुनिया के लोगों को आकर्षित करता था. हालाँकि, शतरंज को सीधे सैनिक प्रशिक्षण कहना ठीक नहीं होगा. यह सेना की औपचारिक ट्रेनिंग नहीं थी. फिर भी खेल में रणनीति, धैर्य और अनुमान का अभ्यास होता था, इसलिए इसे बुद्धि का खेल माना जाता था.

महिलाओं और शाही परिवार में खेल

मुगल शाही परिवार में मनोरंजन के अनेक साधन थे. संगीत, कविता, बाग, शिकार और खेल इनमें शामिल थे. शाही स्त्रियों की दुनिया में भी खेल मौजूद थे. बाबर की बेटी गुलबदन बेगम ने हुमायूंनामा लिखा. इसमें शाही परिवार के जीवन, यात्राओं और रीतिरिवाजों के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है. कुछ प्रसंगों से पता चलता है कि खेलों और दांव की संस्कृति शाही जीवन से बिल्कुल अलग नहीं थी.

शतरंज में फारसी प्रभाव

मुगल शासन की प्रशासनिक और सांस्कृतिक भाषा लंबे समय तक फारसी रही. साहित्य, चित्रकला और दरबारी शिष्टाचार पर फारसी प्रभाव साफ था. शतरंज की शब्दावली पर भी फारसीअरबी असर दिखता है. शाह का अर्थ राजा है. मात से जुड़ी व्याख्या में राजा की हार या असहाय स्थिति का भाव आता है. आधुनिक हिंदी का शब्द शहमात इसी सांस्कृतिक यात्रा की याद दिलाता है. भारत के चतुरंग से फारस की शतरंज और फिर आगे विश्व शतरंज तक की यात्रा, कई सभ्यताओं के संपर्क की कहानी है. मुगलकाल इस लंबी यात्रा का महत्वपूर्ण भारतीय पड़ाव था.

चित्रकला और खेलसंस्कृति

मुगल चित्रकला में दरबार, बाग, शिकार, संगीत और निजी जीवन के कई दृश्य मिलते हैं. ये चित्र बताते हैं कि शाही जीवन में मनोरंजन की बड़ी भूमिका थी. हर चित्र को सीधे ऐतिहासिक प्रमाण नहीं माना जा सकता. फिर भी चित्र और लिखित स्रोत मिलकर उस समय की जीवनशैली का संकेत देते हैं. खेलों की लोकप्रियता भी इसी व्यापक सांस्कृतिक वातावरण का हिस्सा थी. शतरंज जैसे खेल में मौन, एकाग्रता और विचार की जरूरत होती थी. यह दरबार की तेज बहसों, राजनीतिक संबंधों और बौद्धिक संस्कृति के अनुकूल था.

मुगलों के दौर में शतरंज खेलने की परंपरा थी. इसका आधार भारत की चतुरंग परंपरा और फारस की शतरंज संस्कृति दोनों में था. लेकिन इतिहास का सबसे मजबूत प्रमाण मुगलकाल में चौपड़, चौसर और पच्चीसी की लोकप्रियता के लिए मिलता है. अकबर के समय बड़े पच्चीसीबोर्ड और शाही खेलआयोजनों का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. इसलिए मुगलकाल को खेलों से दूर समय नहीं कहा जा सकता. वह रणनीति, मनोरंजन, दांव, शाही प्रदर्शन और सांस्कृतिक मेलजोल का दौर था. शतरंज उस व्यापक खेलजगत का एक बुद्धिमत्तापूर्ण और प्रतिष्ठित हिस्सा थी.

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