चांदीसोने की जड़ी से बनती है साड़ी, गाजीपुर में फिर जीवंत हुई जामदानी बुनकरी की विरासत, नई पीढ़ी सीख रही सदियों पुरानी कला

चांदीसोने की जड़ी से बनती है साड़ी, गाजीपुर में फिर जीवंत हुई जामदानी बुनकरी की विरासत, नई पीढ़ी सीख रही सदियों पुरानी कला

Ghazipur Jamdani Saree: उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में सदियों पुरानी जामदानी बुनकरी की परंपरा को दोबारा से जीवंत करने की कोशिश की जा रही है.जिले के नंदगंज इंडस्ट्रियल एरिया में जामदानी साड़ियों का निर्माण एक बार फिर शुरू हो गया है. भारत सरकार के हैंडलूम विभाग की पहल से इस दुर्लभ कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है. इसके लिए 45 दिनों का निशुल्क प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं और युवा हिस्सा लेकर इस पारंपरिक बुनाई की बारीकियां सीख रहे हैं.

चांदीसोने की जड़ी से बनती है साड़ी, गाजीपुर में फिर जीवंत हुई जामदानी बुनकरी की विरासत, नई पीढ़ी सीख रही सदियों पुरानी कला

जामदानी साड़ी भारतीय हथकरघा उद्योग की सबसे उत्कृष्ट कलाओं में गिनी जाती है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इसकी पहचान महीन बुनावट, आकर्षक डिजाइन और शाही अंदाज से होती है. गाजीपुर में तैयार की जा रही जामदानी साड़ियां पूरी तरह 100 प्रतिशत कच्चे कॉटन के कपड़े पर बनाई जाती हैं. इन्हें इस तरह बुना जाता है कि साड़ी को दोनों तरफ से पहना जा सकता है. फ्रंट और बैक दोनों ओर डिजाइन लगभग एक जैसा दिखाई देता है, जो इसकी सबसे अनोखी विशेषताओं में से एक है.

45 दिन की मुफ्त ट्रेनिंग से तैयार हो रहे नए कारीगर

इस पारंपरिक कला को विलुप्त होने से बचाने के लिए भारत सरकार का हैंडलूम विभाग विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहा है. 45 दिनों तक चलने वाले इस नि:शुल्क प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को जामदानी बुनाई की तकनीक, डिजाइन तैयार करने और करघे पर बारीक काम करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. प्रशिक्षण लेने वाली महिलाओं का कहना है कि इससे उन्हें रोजगार के साथसाथ पारंपरिक कला से जुड़ने का अवसर भी मिल रहा है.

कारीगरों का मानना है कि जामदानी सिर्फ एक वस्त्र नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यदि नई पीढ़ी इसे सीखेगी, तभी यह कला आने वाले वर्षों तक जीवित रह सकेगी.

चांदी और सोने की जरी से बढ़ती है साड़ी की शान

जामदानी साड़ियों की सबसे बड़ी खासियत इनमें इस्तेमाल होने वाली कीमती जरी है. कारीगर बताते हैं कि जरी में लगभग 98 प्रतिशत चांदी और 2 प्रतिशत सोने का उपयोग किया जाता है. एक साड़ी तैयार करने में करीब 150 से 200 ग्राम चांदी और लगभग एक ग्राम सोने की जरूरत पड़ती है. यही वजह है कि इन साड़ियों की कीमत बाजार में चांदी और सोने के भाव के अनुसार बदलती रहती है.

एक साड़ी बनाने में लग जाते हैं कई महीने

जामदानी साड़ी तैयार करना बेहद धैर्य और मेहनत का काम है. सामान्य डिजाइन वाली एक साड़ी को तैयार करने में 35 से 40 दिन का समय लगता है. वहीं, यदि डिजाइन अधिक जटिल और कलात्मक हो तो इसे पूरा करने में कई महीने तक लग सकते हैं. कारीगरों का कहना है कि जितना अधिक समय और मेहनत किसी साड़ी पर लगती है, उसकी कीमत भी उतनी ही अधिक होती है.

ढाई लाख रुपये तक बिक चुकी है जामदानी साड़ी

गाजीपुर के अनुभवी बुनकर शहाबुद्दीन अंसारी बताते हैं कि उन्होंने करीब पांच वर्ष पहले एक विशेष जामदानी साड़ी तैयार की थी, जिसकी कीमत लगभग ढाई लाख रुपये थी. उनके अनुसार जामदानी बुनाई केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि वर्षों के अनुभव, धैर्य और समर्पण का परिणाम है. हर धागा और हर डिजाइन कारीगर की मेहनत और कला का परिचय देता है.

रोजगार के साथ विरासत बचाने की पहल

हैंडलूम विभाग और स्थानीय कारीगरों की इस पहल से न केवल पारंपरिक बुनकरी को नया जीवन मिल रहा है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तरह के प्रशिक्षण और प्रोत्साहन कार्यक्रम लगातार चलते रहे तो गाजीपुर की जामदानी साड़ियां एक बार फिर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी खास पहचान बना सकती हैं.

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