जो रूस पूरी दुनिया को तेल बेचता है, उसे आज भारत से पेट्रोल क्यों मंगाना पड़ गया?

जो रूस पूरी दुनिया को तेल बेचता है, उसे आज भारत से पेट्रोल क्यों मंगाना पड़ गया?

दुनिया के ऊर्जा बाजार में एक बहुत ही हैरान करने वाली घटना सामने आई है. जिस रूस से दुनिया भर के देश तेल खरीदते हैं, आज उसे खुद अपने देश की गाड़ियां चलाने के लिए भारत से पेट्रोल मंगाना पड़ रहा है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत से भेजा गया पेट्रोल का पहला बड़ा जत्था 5 अगस्त को रूस पहुंच चुका है. जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने वाली डेटा एजेंसी केपलर ने भी इस बात की पुष्टि की है. ये इतिहास में पहली बार है जब मॉस्को ने दक्षिण एशियाई देश भारत से मोटर ईंधन खरीदा है. भारत से लंबी दूरी तय करके रूस तक पहुंचने वाला ये पेट्रोल इस बात का इशारा है कि वहां ईंधन का संकट कितना गहरा चुका है. अब सवाल यह उठता है कि दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक रूस को इस नौबत तक क्यों आना पड़ा?

रिफाइनरियों पर हमले से गहराया संकट

इस पूरे संकट की मुख्य वजह रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा लंबा युद्ध है. हाल के महीनों में यूक्रेनी सेना ने सीधे रूस की तेल रिफाइनरियों पर ताबड़तोड़ ड्रोन और मिसाइल हमले शुरू कर दिए हैं. ईए एनालिटिक्स के आंकड़ों पर गौर करें, तो पता चलता है कि इन हमलों की वजह से जुलाई महीने में रूस में कच्चा तेल साफ करने की क्षमता भारी गिरावट के साथ महज 36 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई है. यह सामान्य दिनों के मुकाबले करीब एक तिहाई कम है.

हमलों की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले हफ्ते ही यूक्रेन ने पांच रूसी रिफाइनरियों को निशाना बनाया और इस हफ्ते भी दो अन्य ठिकानों पर हमले हुए हैं. घरेलू बाजार में पेट्रोलडीजल की इस किल्लत को देखते हुए रूस को खुद अपने ईंधन के निर्यात पर रोक लगानी पड़ी है ताकि देश के अंदर हाहाकार न मचे.

भारत की नायरा एनर्जी बनी मददगार

इस मुश्किल वक्त में रूस की मदद के लिए भारत की नायरा एनर्जी लिमिटेड सामने आई है. यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक मजबूत कारोबारी कनेक्शन है. दरअसल, रूस की सबसे बड़ी और सरकारी तेल कंपनी रोसनेफ्ट के पास नायरा एनर्जी में 49.13% की बड़ी हिस्सेदारी है. नायरा एनर्जी की गुजरात के वाडिनार में एक बहुत बड़ी रिफाइनरी है, जो हर दिन करीब 4 लाख बैरल कच्चे तेल को प्रोसेस करती है. नायरा को भी अपना पेट्रोल बेचने के लिए एक नए बाजार की तलाश थी.

पहले हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन उनका एक बड़ा ग्राहक हुआ करता था, लेकिन हाल ही में एचपीसीएल ने अपनी खुद की रिफाइनिंग क्षमता बढ़ा ली है और वह अपना ईंधन खुद बनाने लगा है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। ऐसे में नायरा के लिए रूस एक बड़े बाजार के रूप में उभरा है. केपलर के मुख्य विश्लेषक सुमित रितोलिया का कहना है कि भारतीय बैरल का वहां पहुंचना यह बताता है कि रूस में पेट्रोल का संतुलन पूरी तरह से बिगड़ चुका है.

समंदर के बीच ऐसे बदल रहे हैं तेल के जहाज

भारत से रूस तक पेट्रोल पहुंचाने का यह सफर सीधा और आसान नहीं है. अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों से बचने और समय बचाने के चक्कर में तेल को समंदर के बीच में ही एक जहाज से दूसरे जहाज पर पलटा जा रहा है. व्यापारी भाषा में इसे ‘शिपटूशिप’ ट्रांसफर कहा जाता है. आंकड़ों के मुताबिक, 18 जून को रूसी झंडे वाले ‘साइक्लोन’ नाम के जहाज ने गुजरात के वाडिनार से 42,000 टन पेट्रोल लोड किया था. इसके बाद 6 जुलाई को मिस्र के डेमिएटा बंदरगाह के पास समंदर में यह सारा पेट्रोल ओमान के झंडे वाले जहाज ‘गार्नेट’ में ट्रांसफर कर दिया गया. यही गार्नेट जहाज अगस्त के पहले हफ्ते में रूस के तट पर पहुंचा है.

पेट्रोल की और भी कई खेप इसी तरह रूस भेजी जा रही हैं. ‘वार्ज’ नाम के एक अन्य जहाज ने 6 जुलाई को वाडिनार से 40,000 टन पेट्रोल भरा और जुलाई के अंत में डेमिएटा के पास ही इसे दूसरे जहाज में पलट दिया. केपलर के डेटा के मुताबिक, यह तेल ‘बीस्ट’ नाम के जहाज में गया है. बीस्ट का तय रूट मोरक्को के टेंजियर तक था, लेकिन वह उसे पार करके अब अटलांटिक महासागर से होते हुए उत्तर की ओर जा रहा है. इसी तरह एक तीसरा जहाज ‘फोटोन’ कैमरून का झंडा लगाकर 13 जुलाई को वाडिनार से निकला और उसने अपना पेट्रोल 2829 जुलाई को रूसी जहाज ‘टैलिसमैन’ में ट्रांसफर कर दिया.

‘डार्क फ्लीट’ का इस्तेमाल कर रही है नायरा

इस पूरे ऑपरेशन में जिन जहाजों का इस्तेमाल हो रहा है, वे अंतरराष्ट्रीय रडार पर हैं. गार्नेट को छोड़कर बाकी सभी जहाज रूस के शिप रजिस्टर में दर्ज हैं. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल जुलाई में यूरोपीय संघ द्वारा कड़े प्रतिबंध लगाए जाने के बाद से नायरा एनर्जी कच्चा तेल मंगाने और ईंधन भेजने के लिए ‘डार्क फ्लीट’ का इस्तेमाल कर रही है. यह उन जहाजों का समूह होता है जो अपनी लोकेशन छिपाकर काम करते हैं.

यूरोपीय संघ ने इनमें से लगभग सभी जहाजों पर प्रतिबंध लगा रखा है, जबकि गार्नेट और टैलिसमैन पर तो अमेरिका ने भी पाबंदियां लगाई हैं. मौजूदा वक्त में वैश्विक ऊर्जा बाजार दोहरी मार झेल रहा है. एक ओर यूक्रेन युद्ध से रूस की रिफाइनरियां काम नहीं कर पा रही हैं, तो दूसरी तरफ मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने भी दुनिया भर में ईंधन की सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है. ऐसे में रूस का अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए भारत का दरवाजा खटखटाना विश्व व्यापार के बदलते समीकरणों को दिखाता है.

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