Quick Samachar: एक वक्त था जब रात के 1010:30 बजते ही करोड़ों भारतीय घरों में एक ही नाम गूंजता था तुलसी वीरानी। वह सिर्फ एक टीवी शो में किरदार नहीं थीं, बल्कि भारतीय परिवारों की भावनाओं, संस्कारों और रिश्तों का चेहरा बन चुकी थीं। उनकी खुशी पर दर्शक मुस्कुराते थे, उनके दर्द पर आंसू बहाते थे और उनके फैसलों पर बहस करते थे।
स्मृति ईरानी द्वारा निभाया गया यह किरदार इतना लोकप्रिय हुआ कि उसने भारतीय टेलीविजन का पूरा इतिहास बदल दिया। ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ की तुलसी ने न सिर्फ सासबहू सीरियलों के स्वर्णिम दौर की शुरुआत की, बल्कि एक ऐसा सांस्कृतिक प्रभाव छोड़ा, जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है। चलिए आज आपको अपने अमर किरदार कॉलम ने आज हम इसी के बारे में बताते हैं।
जब भारतीय टीवी बदल रहा था
90 के दशक के अंत तक भारतीय टेलीविजन पर पारिवारिक ड्रामे जरूर थे, लेकिन उनका प्रभाव सीमित था। दर्शक मनोरंजन के लिए फिल्मों या साप्ताहिक धारावाहिकों पर निर्भर रहते थे। फिर साल 2000 में निर्माता एकता कपूर ने एक ऐसा शो लॉन्च किया, जिसने टीवी की पूरी तस्वीर बदल दी।
यह शो था ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’। स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाले इस शो में दर्शकों को एक गुजराती जॉइंट फॅमिली की कहानी देखने को मिली थी। उस परिवार की लीड तुलसी वीरानी, जो अपने संस्कारों, मूल्यों और समर्पण के कारण धीरेधीरे दर्शकों की पसंदीदा बन गईं। किसी ने नहीं सोचा था कि यह शो आठ सालों तक भारतीय टेलीविजन पर राज करेगा।
स्मृति ईरानी का संघर्ष
आज स्मृति ईरानी को लोग एक सफल राजनेता और केंद्रीय मंत्री के रूप में जानते हैं, लेकिन उनका शुरुआती सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा। दिल्ली में जन्मीं स्मृति ने अपने करियर की शुरुआत मॉडलिंग से की थी। उन्होंने मिस इंडिया प्रतियोगिता में भी हिस्सा लिया था, लेकिन सफलता तुरंत नहीं मिली। मुंबई आने के बाद उन्हें कई असफलताओं का सामना करना पड़ा।
बताया जाता है कि उन्होंने शुरुआती दिनों में आर्थिक कठिनाइयों के बीच छोटेछोटे काम भी किए। अभिनय में अवसर पाने के लिए लगातार ऑडिशन दिए, लेकिन बड़ी सफलता उनसे दूर थी। फिर आया ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ का मौका। यह भूमिका उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। जैसे ही शो ऑन एयर हुआ, स्मृति ईरानी रातोंरात देश की सबसे लोकप्रिय टीवी अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं।
क्यों खास थी तुलसी वीरानी?
उस दौर में भारतीय समाज तेजी से बदल रहा था। संयुक्त परिवारों की परंपरा और आधुनिक जीवनशैली के बीच संतुलन बनाने की कोशिश चल रही थी। ऐसे समय में तुलसी वीरानी एक ऐसे किरदार के रूप में सामने आईं, जिसमें परंपरा और मजबूती दोनों का मेल था।
वह केवल एक आदर्श बहू नहीं थीं। बल्कि, जब परिवार पर संकट आता, तो वही सबसे पहले आगे खड़ी होतीं। जब रिश्तों में दरार आती, तो वही उन्हें जोड़ने की कोशिश करतीं। जब अन्याय होता, तो वह उसके खिलाफ आवाज उठातीं। दर्शकों को तुलसी में अपने घर की बेटी, बहू, मां और पत्नी की झलक दिखाई देती थी। यही कारण था कि लोग उनके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ गए।
एक किरदार जिसने टीआरपी के रिकॉर्ड तोड़ दिए
2000 से 2008 के बीच ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ भारतीय टेलीविजन का सबसे चर्चित शो बन गया। उस समय सोशल मीडिया नहीं था, लेकिन फिर भी शो की लोकप्रियता ऐसी थी कि इसके एपिसोड आने के समय पर हर जगह मानों सन्नाटा छा जाता था। कई परिवार रात का खाना शो के समय के हिसाब से खाते थे।
टीआरपी की दौड़ में यह धारावाहिक लगातार टॉप पर बना रहा। तुलसी वीरानी की लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी कि स्मृति ईरानी को लोग उनके असली नाम से कम और ‘तुलसी’ के नाम से ज्यादा पहचानने लगे।
सासबहू युग की शुरुआत
‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ की सफलता के बाद भारतीय टीवी पर सासबहू धारावाहिकों की बाढ़ आ गई। ‘कहानी घरघर की’, ‘कसौटी जिंदगी की’, ‘कुसुम’, ‘कसम से’ और कई अन्य धारावाहिकों ने इसी फॉर्मूले को अपनाया। एकता कपूर को भारतीय टीवी की क्वीन कहा जाने लगा और उनके शो लगभग हर चैनल की रेटिंग पर हावी हो गए।
हालांकि, समय के साथ इस शैली की आलोचना भी हुई। कुछ लोगों का मानना था कि इन धारावाहिकों में जरूरत से ज्यादा नाटक और अवास्तविक घटनाएं दिखाई जाती हैं। लेकिन यह भी सच है कि इन शो ने भारतीय टीवी इंडस्ट्री को आर्थिक रूप से नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
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