Pakistan : पाकिस्तान कभी किसी का यूं ही भला नहीं चाहता. वह हर काम अपने फायदे के लिए करता है. ईरानअमेरिका युद्ध में भी उसने अपने फायदे के लिए बीचबचाव किया. अब इसकी कीमत वह वसूलना चाहता है. ईरानअमेरिका जंग में मीडिएटर बनकर पाकिस्तान असल में दलाली कर रहा है. उसके रोल पर सबको पहले से आशंका थी. पूरी दुनिया सोच रही थी कि आखिर आतंकवाद का जनक पाकिस्तान युद्ध खत्म करने में क्यों जुटा है? आखिर वह अमेरिका की जी हुजूरी क्यों कर रहा है, आखिर उसे ईरान के बीच मध्यस्थता की इतनी बेताबी क्यों है? आखिर इसके पीछे उसकी मंशा क्या है? अब इसके पीछे की असल वजह सामने आ गई है. जी हां, पाकिस्तान सच में दलाली ही कर रहा था. दरअसल, पाकिस्तान ने अमेरिका से 10 अरब डॉलर की मुद्रा सहायता यानी करेंसी सपोर्ट फैसिलिटी की मांग की है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान युद्ध में मध्यस्थता की भूमिका निभाने के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका से 10 अरब डॉलर की करेंसी सपोर्ट सुविधा मांगी है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। सूत्र ने बताया कि इससे उसके विदेशी मुद्रा भंडार यानी फॉरेक्स रिजर्व को मजबूत करने और आर्थिक तंगी से जूझ रही अर्थव्यवस्था को राहत देने में मदद मिल सकती है.
क्यों अहम है पाकिस्तान की यह मांग
पाक की ओर से यह मांग ऐसे समय में की गई है जब ईरान युद्ध से जुड़े बातचीत के प्रयासों में पाकिस्तान की भूमिका से उसकी कूटनीतिक स्थिति मजबूत हुई है. ईरानअमेरिका युद्ध में अपने मध्यस्थ वाले रोल की वजह से इस्लामाबाद को उम्मीद है कि वह अमेरिका और अन्य अंतरराष्ट्रीय साझेदारों से आर्थिक लाभ हासिल कर सकता है.
सूत्र के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय विनिमय स्थिरीकरण सहायता सुविधा शुरू करने का अनुरोध किया है. यह सुविधा अधिकतम पांच साल की अवधि के लिए होगी.
पाकिस्तान की डिमांड का क्या मकसद
इस सुविधा का मकसद विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये को सहारा देना है. अगर इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाती है तो पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी होगी. इससे पाकिस्तानी रुपये पर दबाव कम होगा और देश की बहुपक्षीय संस्थाओं से मिलने वाली आर्थिक मदद पर निर्भरता भी घट सकती है. साथ ही, पाकिस्तान आईएमएफ यानी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष कार्यक्रम के तहत राजकोषीय और मौद्रिक सुधार भी लागू करता रहेगा.
फिलहाल, पाकिस्तान आईएमएफ के 7 अरब डॉलर के कार्यक्रम के तहत काम कर रहा है. इसके लिए उसे टैक्स बढ़ाने, सरकारी खर्च पर नियंत्रण रखने और कई अन्य आर्थिक सुधार लागू करने पड़े हैं. इन फैसलों की राजनीतिक कीमत भी सरकार को चुकानी पड़ी है. अमेरिकी ट्रेजरी की ओर से मिलने वाली एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन फैसिलिटी बहुत कम देशों को दी जाती है. इसके तहत डॉलर, करेंसी स्वैप या गारंटी जैसी सहायता देकर किसी देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत किया जाता है और उसकी मुद्रा को स्थिर रखने में मदद मिलती है. यह अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा कुछ बड़े केंद्रीय बैंकों के साथ किए जाने वाले स्थायी डॉलर स्वैप समझौतों से अलग व्यवस्था है.
पहले भी आईएमएफ की मदद से टला डिफॉल्ट
साल 2023 में पाकिस्तान ने आईएमएफ से 3 अरब डॉलर का स्टैंडबाय पैकेज हासिल कर संभावित डिफॉल्ट टाल दिया था. इसके बाद उसे 7 अरब डॉलर की एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी भी मिली. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिए 1.3 अरब डॉलर का अलग कर्ज भी मिला. हालांकि, पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार अभी भी चीन और सऊदी अरब जैसे देशों से मिलने वाली आधिकारिक फंडिंग, रोलओवर और जमा राशि पर काफी हद तक निर्भर है.
अमेरिका के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है पाकिस्तान
अमेरिका से इस मदद की मांग ऐसे समय में की गई है जब पाकिस्तान, वॉशिंगटन के साथ अपने आर्थिक संबंध और मजबूत करना चाहता है. अगर यह मुद्रा सहायता सुविधा मिलती है तो यह पाकिस्तान के लिए आर्थिक सुरक्षा कवच के साथसाथ एक मजबूत राजनीतिक संकेत भी होगी. इससे विदेशीमुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा और आईएमएफ की किस्तों तथा आपातकालीन आर्थिक मदद पर निर्भरता घट सकती है.
हालांकि, पाकिस्तान के आर्थिक सुधारों से अर्थव्यवस्था में कुछ स्थिरता आई है, लेकिन इसके लिए लोगों पर ज्यादा टैक्स लगाए गए हैं, सरकारी खर्च में कटौती की गई है और विकास व कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च की गुंजाइश सीमित हुई है. इस तरह देखा जाए तो आसिम मुनीर और शहबाज शरीफ अब तक अमेरिका की जी हुजूरी में क्यों लगे थे, इसका सबूत मिल गया है. अब समझ आ गया है कि आखिर पाकिस्तान काफी समय से अमेरिका की गुलामी क्यों क रहा था.