Quick Samachar: Pradyumna Chaturthi 2026 Date And Time: आज 18 जून को प्रद्युम्न चतुर्थी का पावन पर्व मनाया जा रहा हैं। सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ पुत्र प्रद्युम्न का विशेष महत्व बताया गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्रद्युम्न भगवान कामदेव के अवतार थे।

उनके दिव्य जीवन, अद्भुत पराक्रम और चमत्कारिक घटनाओं की स्मृति में का पर्व मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु, माता रुक्मिणी और प्रद्युम्न की पूजा कर सुख, समृद्धि और पारिवारिक कल्याण की कामना करते हैं।
भगवान प्रद्युम्न कौन है?
पौराणिक कथा के अनुसार, प्रद्युम्न भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका जन्म द्वारका में अत्यंत शुभ योग और नक्षत्रों में हुआ था। उनके जन्म से पूरे यदुवंश में हर्ष का वातावरण छा गया था। ऋषिमुनियों ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक असाधारण तेज, पराक्रम और दिव्य गुणों से युक्त होगा।
धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म किए जाने के बाद उनकी पत्नी रति ने कठोर तपस्या की थी। उसी तपस्या के फलस्वरूप कामदेव ने प्रद्युम्न के रूप में पुनर्जन्म लिया।
आखिर क्यों मनाई जाती है प्रद्युम्न चतुर्थी?
प्रद्युम्न चतुर्थी भगवान प्रद्युम्न के दिव्य जीवन, चमत्कारिक रूप से जीवित बचने, शम्बरासुर के वध और मातापिता से पुनर्मिलन की स्मृति में मनाई जाती हैं। इस दिन भक्त कथा श्रवण, पूजन और प्रार्थना कर जीवन में सुख, समृद्धि और पारिवारिक खुशहाली की कामना करते हैं। यह पर्व आस्था, साहस और ईश्वरीय कृपा का प्रतीक माना जाता हैं।
मायावती और प्रद्युम्न की क्या है रहस्यमयी कथा
जब महल की रसोई में मछली को काटा गया तो उसके भीतर से जीवित बालक प्रद्युम्न मिले। महल में रहने वाली मायावती ने उनका पालनपोषण किया। देवर्षि नारद ने मायावती को बताया कि यह बालक वास्तव में कामदेव का पुनर्जन्म है और मायावती पूर्व जन्म में उनकी पत्नी रति थीं।
मायावती ने प्रद्युम्न को विभिन्न विद्याओं और मायावी शक्तियों का ज्ञान दिया, जिससे वे एक महान योद्धा बन सके।
जब प्रद्युम्न को अपने वास्तविक जन्म का रहस्य पता चला, तो उन्होंने शम्बरासुर को चुनौती दी। भीषण युद्ध में शम्बरासुर ने अपनी समस्त मायावी शक्तियों का प्रयोग किया, लेकिन प्रद्युम्न ने अपनी दिव्य शक्ति से उसका अंत कर दिया और भविष्यवाणी को सत्य सिद्ध किया।
इसके बाद वे मायावती के साथ द्वारका लौटे. उनका तेज और स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण से मिलताजुलता था. देवर्षि नारद ने पूरी घटना का वर्णन कर बताया कि यही वह पुत्र हैं, जो जन्म के कुछ दिनों बाद लापता हो गए थे। वर्षों बाद पुत्र को पाकर माता रुक्मिणी और भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए।
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