मॉनसून की दस्तक के साथ ही हर साल आलू की कीमतों में गिरावट की खबरें भी सामने आने लगती हैं। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में कम कीमत मिलने से किसानों के अपनी फसल सड़कों पर फेंकने के मामले सुर्खियों में आते रहे हैं. अब उत्तर प्रदेश से भी ऐसी ही तस्वीर सामने आ रही है. कानपुर, कन्नौज और मैनपुरी समेत कई जिलों में आलू उत्पादक किसान अपनी फसल का उचित दाम नहीं मिलने की शिकायत कर रहे हैं. किसानों का कहना है कि मंडियों में आलू की कीमत इतनी नीचे पहुंच गई है कि कई जगह उन्हें लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है.

किसानों का दावा है कि बड़ी मात्रा में आलू अभी भी कोल्ड स्टोरेज में भंडारित है. मंडियों में इसके दाम इतने नीचे पहुंच गए हैं कि कई किसान अपनी उत्पादन और परिवहन लागत तक नहीं निकाल पा रहे हैं. कुछ जगहों से किसानों के महज 1 रुपये प्रति किलो के भाव पर आलू बेचने को मजबूर होने का दावा किया जा रहा है. यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि भारत में आलू का कुल उत्पादन करीब 58.45 मिलियन टन है, जिसमें उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी लगभग 30 से 35 फीसदी बताई जाती है. यानी देश के कुल आलू उत्पादन में यूपी की बड़ी हिस्सेदारी होने के चलते यहां के किसान ज्यादा प्रभावित होंगे.
एक रुपये प्रति किलो में आलू बिकने की खबरों पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि क्या ऐसे उत्तर प्रदेश एक ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनेगा. इसको लेकर अखिलेश यादव ने अपने X अकाउंट पर एक वीडियो अपलोड किया है. इस वीडियो में कानपुर की चकरपुर मंडी में हाइब्रिड आलू कम कीमत पर बिकने का दावा किया जा रहा है. वीडियो में एक युवक किसानों की स्थिति बताते हुए कहता सुनाई देता है कि आलू करीब एक रुपये किलो बिक रहा है. फिर इसके बाद छंटाई का खर्च भी किसान को उठाना पड़ रहा है.
क्या किसान को 1 रुपये किलो आलू की क़ीमत देने से बनेगी 1 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी।
ये है डील की ढील का परिणाम
हैरानपरेशान है देश का किसानवाह रे मुख्यमंत्री जी! pic.twitter.com/JWQOMpCkQZ
— Akhilesh Yadav August 11, 2026
आलू का बाजार कैसे काम करता है?
किसान को अपनी फसल का इतना कम दाम क्यों मिल रहा है? क्या वजह सिर्फ ज्यादा उत्पादन है या इसके पीछे बाजार, भंडारण और मांग से जुड़ी कई दूसरी समस्याएं भी हैं. यह सब समझने से पहले आपको आलू का बाजार समझना होगा. आलू की फसल खेत से निकलने के बाद सीधे उपभोक्ता तक नहीं पहुंचती है. जिन बड़े किसानों के पास सुविधा होती है. वह अपनी फसल को कोल्ड स्टोरेज में स्टोर कर लेते हैं. फिर जब आलू की कीमतों में इजाफा होता है, तब उसे निकालते हैं.
वहीं, छोटे किसानों, जिनके पास कोल्ड स्टोरेज की सुविधा नहीं होती है. उन्हें अपनी फसल को तुरंत मंडी में व्यापारी और आढ़ती को बेचना पड़ता है. उस दौरान मंडी में जिस रेट पर आलू की बिक्री हो रही होती है, उसी दाम पर किसानों को अपनी फसल को मजबूरन बेचना पड़ता है. फिलहाल खबरें हैं कि बाजार में 1 रुपये प्रति किलो में आलू बिक रहा है. लेकिन उपभोक्ताओं के लिए कीमतें कम नहीं हो रही हैं.
मार्केट में आलू अब भी 22 रुपये प्रति किलो उपभोक्ताओं को दिए जा रहे हैं.इसका जवाब है सप्लाई चेन. किसान से आलू मंडी तक पहुंचता है. इसके बाद व्यापारी, थोक विक्रेता और खुदरा दुकानदार की भूमिका आती है. वह किसानों से फसल खरीदने के बाद अपने हिसाब से आलू की बिक्री मार्केट में करते हैं.
किसानों को क्यों 1 रुपये प्रति किलो तक के रेट में बेचना पड़ रहा है आलू?
- अधिक उपज: कानपुर के आढ़ती विमलेश दुबे का कहना है कि आलू के रेट गिरने की वजह बंपर फसल भी होती है. जब किसी फसल की उपलब्धता मांग के मुकाबले ज्यादा हो जाती है तो व्यापारी किसानों से ज्यादा कीमत पर खरीदने को तैयार नहीं होते. जिन किसानों के पास कोल्ड स्टोरेज की अनुपलब्धता के कारण फसल बेचने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं होते हैं. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। छोटे किसानों को कोल्ड स्टोरेज 300 रुपये से 340 रुपये प्रति क्विंटल आलू का सालाना देना बहुत महंगा पड़ता है. ऐसे में उनकी फसल जल्द खराब होने की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए भाव नीचे आ जाता है.
- कोल्ड स्टोरेज में रखा आलू भी बना परेशानी: वित्तीय वर्ष में कोल्ड स्टोरेज में 21 लाख 82 हजार 282 मीट्रिक टन से अधिक आलू रखा गया था, जिसमें से आज भी लगभग 16 लाख 98 हजार 252 मीट्रिक टन आलू भंडारित है. इसका साफ मतलब यह है देश में आलू की उत्पादकता अभी पर्याप्त है. यही वजह है कि मंडियों में अब व्यापारी आलू की फसल लेने को तैयार नहीं है. अगर वह फसल किसानों से खरीद भी रहे हैं तो औनेपौने दाम ही चुका रहे हैं. मजबूरी में किसान को अपनी फसल सस्ते रेट पर बेचना पड़ रहा है.
- किसान के पास इंतजार करने की गुंजाइश नहीं है: किसान हमेशा फसल को रोककर नहीं रख सकता. उसे अगली फसल की तैयारी करनी होती है। खेती के लिए लिए गए कर्ज का भुगतान करना होता है और परिवार की जरूरतें भी पूरी करनी होती हैं ऐसे में अगर मंडी में आलू का भाव बहुत कम है तो किसान के सामने दो विकल्प होते हैं या तो फसल बेचकर नुकसान उठाए या फिर उसे रोककर रखने के लिए अतिरिक्त खर्च करे.छोटे और सीमांत किसानों के लिए दूसरा विकल्प ज्यादा मुश्किल होता है. वहीं, किसान अगर फसल अपने पास रोककर रखता है तो उसके जल्द खराब होने की गुंजाइश बढ़ जाती है, जिससे उसे उस फसल से कोई आमदनी नहीं हो पाए. ऐसे में कई किसान मजबूरी में कम भाव पर ही आलू बेच देते हैं.
किसानों को ऐसी परिस्थितियों से बचाने का क्या रास्ता है?
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को फसल की मांग और उपलब्धता के आंकड़ों के आधार पर खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. अगर किसी फसल का उत्पादन या उपलब्धता देश में उसकी मांग से अधिक है, तो किसानों को अन्य लाभकारी फसलों की ओर रुख करने की सलाह दी जानी चाहिए, ताकि भविष्य में उन्हें अपनी उपज बेचने में परेशानी न हो और नुकसान का जोखिम कम किया जा सके.
इसके साथ ही कोल्ड स्टोरेज चेन को मजबूत करना, बाजार में प्रभावी सरकारी हस्तक्षेप और भावांतर जैसी योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू करना भी जरूरी है. इससे कीमतों में भारी गिरावट के दौरान किसानों को राहत मिल सकती है और ऐसी परिस्थितियों से बचने में मदद मिल सकती है.