नोएडा में मोबाइल स्क्रीन पर कुछ सेकंड की रील, उस पर मिलने वाली लाइककमेंट और आभासी दुनिया में आजादी का एहसास अब कई परिवारों के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है. किशोरों में सोशल मीडिया और मोबाइल को लेकर बढ़ता आकर्षण कई बार उन्हें परिवार से टकराव की स्थिति तक पहुंचा रहा है. खबर के मुताबिक, नोएडा के वन स्टॉप सेंटर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्लीएनसीआर में हर महीने करीब 8 से 10 किशोरियां परिवार से विवाद पर घर छोड़ने या भावनात्मक परेशानी से जुड़े मामलों में पहुंच रही हैं. इसके अलावा, काउंसलर के पास रोजाना करीब 10 से 12 किशोरियों के मामले पहुंचने की बात सामने आई है.

डांट पड़ी तो भाई को लेकर घर से निकल गई किशोरी
जानकारी के मुताबिक, मई में दिल्ली के अशोक नगर की 14 वर्षीय किशोरी दिनरात रील देखने को लेकर पिता की डांट से नाराज हो गई. वह अपने 11 वर्षीय छोटे भाई को साथ लेकर घर से निकल गई. दोनों ट्रेन से दिल्लीहरियाणा क्षेत्र में भटकते रहे. पुलिस ने करीब 24 घंटे के बाद उन्हें नई दिल्ली रेलवे स्टेशन क्षेत्र से बरामद किया और वन स्टॉप सेंटर पहुंचाया.
काउंसलिंग के बाद दोनों को परिवारों के साथ भेज दिया गया. इसी तरह 28 मई को 17 वर्षीय अमित के पिता ने उसे दिनभर मोबाइल पर रील देखने और रील बनाने तथा पढ़ाई पर ध्यान नहीं देने को लेकर फटकार लगाई. नाराज होकर वह रात में घर से निकल गया. काउंसलिंग के दौरान उसने कहा कि वह अपनी जिंदगी खुद जीना चाहता है और अकेले काम कर रहेगा. लगातार तीन बार हुई काउंसलिंग के बाद वह परिवार के साथ वापस लौट गया.
मनोवैज्ञानिक बोले, किशोरों में लाइककमेंट का असर ज्यादा
मनोवैज्ञानिक डॉक्टर सोनी कौशल के मुताबिक, किशोर अवस्था में दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम अधिक संवेदनशील होता है. सोशल मीडिया पर मिलने वाली लाइककमेंट और लगातार नए वीडियो या क्रिएटिव कंटेंट बनाने पर उन्हें तुरंत खुशी और स्वीकार्यता का एहसास होता है.
ऐसे में किशोर कई बार तत्काल लिए गए फैसलों को सही मानने लगते हैं और उनके दूरगामी परिणामों पर विचार नहीं करते. उनका कहना है कि मोबाइल पर सीधे प्रतिबंध लगाने के बजाय बच्चों से संवाद करते हुए संतुलित नियम बनाना जरूरी है.
वहीं, काउंसलर अनीता का कहना है कि कई मामलों में किशोरियां आवेश में घर छोड़ने का फैसला लेती हैं. काउंसलिंग में पहले उनकी बातों को पूरी तरह सुना जाता है और फिर परिवार के साथ संवाद कर दोनों पक्षों का समाधान करने का प्रयास किया जाता है.
बच्चों को घर भेजना उद्देश्य नहीं, बल्कि काउंसलिंग जरूरी
महिला कल्याण विभाग के डीपीओ मनोज कुमार सिंह के अनुसार, घर से दूर हुए बच्चों का उद्देश्य केवल उनको घर वापस भेजना नहीं है, बल्कि यह भी समझना जरूरी है कि ऐसी स्थिति तक वे क्यों पहुंचे. जरूरत के अनुसार उनकी काउंसलिंग, चिकित्सकीय और कानूनी सहायता दी जाती है.
परिवारों को बच्चों पर केवल रोकटोक करने के बजाय बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहिए. फिलहाल, यह आंकड़ा किसी बड़े जनसंख्या सर्वे का आंकड़ा नहीं है. यह वन स्टॉप सेंटर और काउंसलर तक पहुंचने वाले मामलों पर आधारित है. इसलिए इन्हें पूरे नोएडा के किशोरों की स्थिति का प्रतिशत या वैज्ञानिक सर्वे मानना सही नहीं होगा.