
लखनऊ भारत का इतिहास अनेक गौरवपूर्ण उपलब्धियों, सांस्कृतिक समृद्धि और राष्ट्रीय एकता की प्रेरक गाथाओं से भरा हुआ है। किंतु इसी इतिहास में कुछ ऐसे अध्याय भी हैं, जो मानवता को झकझोर देने वाले रहे हैं। 14 अगस्त, 1947 का भारतविभाजन ऐसा ही एक त्रासद अध्याय है, जिसने लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। स्वतंत्रता का सूर्योदय जहां एक ओर भारतीयों के लिए आनंद और गर्व का अवसर था, वहीं दूसरी ओर देश का विभाजन असंख्य परिवारों के लिए दुख, विस्थापन, हिंसा और असुरक्षा का कारण बन गया। भारत का यह विभाजन किसी विभीषिका से कम नहीं था, जिसमें लाखों शरणार्थी उन प्रांतों और शहरों में चले गए, जहां उनका पहले से कोई संबंध नहीं था। वहां की भाषा, संस्कृति सब अलग थी। ऐसे में शरणार्थियों को अपना जीवन नए सिरे से शुरू करना पड़ा। भारत के विभाजन के दौरान सिंध, लाहौर तथा अमृतसर के अल्पसंख्यकों को विकराल और भयावह त्रासदी सहनी पड़ी।
भारत सरकार ने 14 अगस्त, 2021 को प्रत्येक वर्ष 14 अगस्त को भारतपाक विभाजन की विभीषिका के शिकार निरपराध, असहाय एवं विवश जनमानस की करुण कथा के स्मरण के रूप में ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इस दिवस का उद्देश्य विभाजन की पीड़ा को स्मरण करना, उससे शिक्षा ग्रहण करना तथा राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव के प्रति समाज को जागरूक करना है। यह दिवस केवल अतीत की त्रासदी को याद करने का अवसर नहीं है, अपितु भविष्य के लिए चेतावनी और संकल्प का भी प्रतीक है।
विभाजन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत का स्वतंत्रता संग्राम मूलत एक समावेशी राष्ट्रीय आंदोलन था, जिसमें विभिन्न धर्मों, भाषाओं और समुदायों के लोगों ने समान रूप से भाग लिया। किंतु औपनिवेशिक शासन की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति ने भारतीय समाज में विभाजन की रेखाओं को गहरा किया।
1905 में बंगाल विभाजन, 1909 के मॉर्लेमिंटो सुधारों द्वारा पृथक निर्वाचन व्यवस्था तथा बाद में सांप्रदायिक राजनीति के बढ़ते प्रभाव ने हिंदूमुस्लिम संबंधों में अविश्वास को बढ़ाया। 1940 में मुस्लिम लीग द्वारा पारित लाहौर प्रस्ताव ने पृथक मुस्लिम राष्ट्र की मांग को औपचारिक स्वरूप प्रदान किया।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार शीघ्र सत्ता हस्तांतरण चाहती थी। राजनीतिक परिस्थितियां जटिल होती गईं और अंतत 3 जून 1947 की योजना के अंतर्गत भारत का विभाजन स्वीकार कर लिया गया। 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान तथा 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत अस्तित्व में आए।
विभाजन : एक राजनीतिक निर्णय या ऐतिहासिक भूल
इतिहासकारों और चिंतकों के मध्य यह प्रश्न आज भी चर्चा का विषय है कि क्या विभाजन अपरिहार्य था अथवा इसे रोका जा सकता था। कुछ विद्वान मानते हैं कि उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों, सांप्रदायिक तनावों तथा सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी के कारण विभाजन एक व्यावहारिक समाधान बन गया था। दूसरी ओर अनेक इतिहासकार इसे नेतृत्व की असफलता, ब्रिटिश नीति और सांप्रदायिक राजनीति की परिणति मानते हैं।
प्रख्यात इतिहासकार विपिन चंद्र ने लिखा है कि सांप्रदायिकता कोई अचानक उत्पन्न हुई घटना नहीं थी, अपितु यह लंबे समय तक विकसित हुई राजनीतिक प्रक्रिया का परिणाम थी। वहीं अनेक विचारकों का मत है कि यदि राष्ट्रीय नेतृत्व अधिक धैर्य और दूरदर्शिता का परिचय देता, तो विभाजन जैसी त्रासदी से बचा जा सकता था। निस्संदेह, इतिहास का मूल्यांकन आज के दृष्टिकोण से करना सरल है, किंतु यह भी सत्य है कि विभाजन ने यह सिद्ध कर दिया कि धार्मिक आधार पर राष्ट्र निर्माण स्थायी समाधान नहीं होता।वस्तुत भारत पाकिस्तान विभाजन की विभीषिका भारतीय सभ्यता के उज्ज्वल पक्ष का एक अँधेरा कोना है।
विभाजन की विभीषिका :भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी
भारतविभाजन केवल भौगोलिक सीमाओं का परिवर्तन नहीं था। यह करोड़ों लोगों के जीवन, स्मृतियों, संस्कृतियों और भावनाओं का विखंडन था। अनुमानत लगभग 1.4 से 1.8 करोड़ लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। लाखों लोग शरणार्थी बन गए। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार 5 लाख से लेकर 20 लाख तक लोगों की मृत्यु हुई। हजारों महिलाएँ हिंसा और उत्पीड़न का शिकार बनीं।
जो लोग पीढ़ियों से अपने गाँवों और नगरों में रहते आए थे, उन्हें अचानक अपना सब कुछ छोड़कर अज्ञात भविष्य की ओर बढ़ना पड़ा। लोग अपने घर, खेत, व्यवसाय, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, स्मृतियां और पारिवारिक धरोहरें पीछे छोड़ने के लिए विवश हुए।
रेल की पटरियां, सड़कें और शरणार्थी शिविर मानवीय त्रासदी के साक्षी बने। अनेक परिवार बिछड़ गए, जिनमें से कुछ कभी पुन नहीं मिल सके। लूटपाट, हत्या, मारपीट, आगजनी और बलात्कार का ऐसा अटूट सिलसिला चला कि देखते देखते भारत के दो टुकड़े हो गए। इस देश की सामाजिकआर्थिक व्यवस्था ध्वस्त हो गई। मानव इतिहास में इतना बड़ा रक्तरंजित विस्थापन नहीं हुआ था। लोग अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार तक नहीं कर सके। इस विभीषिका का दर्द आज भी देशवासियों के हृदय के तंतुओं को झनझना देता है।
साहित्यकारों ने भी ग्रंथों में लेखनीबद्ध की विभाजन की पीड़ा
प्रसिद्ध लेखक भीष्म साहनी का ‘तमस’ तथा यशपाल का ‘झूठा सच’ उपन्यास विभाजन की पीड़ा का अत्यंत मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करते हैं। प्रख्यात इतिहासकार डॉ. रघुवेंद्र तंवर की कृति ‘भारत विभाजन की कहानी’ नितांत स्पष्ट, निष्पक्ष और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित विवरण संकलित है। डॉ. चंद्र त्रिखा ने विभाजन की पृष्ठभूमि पर कई ग्रंथों का प्रणयन किया है, जैसे वे 48 घंटे, विभाजन गाथा, वे दिन वे लोग, विभाजन: एक काला अध्याय, रिफ्यूजी, बिछुड़े लोग आदि। इसी संदर्भ में खुशवंत सिंह , अमृता प्रीतम , गुरुदत्त , देवेंद्र सत्यार्थी इत्यादि साहित्यकारों ने अपने ग्रंथों में विभीषिका का जीवंत चित्रण किया है। घृणा, पागलपन, हिंसा एवं लूटपाट की पृष्ठभूमि में हुए विभाजन के दर्द को अमृता प्रीतम की एक ऐतिहासिक रचना के माध्यम से थोड़ा सा अनुभव किया जा सकता है। रचना का मूल स्वरूप इस प्रकार है
अज आखां वारिश शाह नूं, कितों कब्रां विचों बोल।
आज ओस किताबें इश्क दा, कोई अगला वरका फोल।
इक रोयी सी धी पंजाब दी, तू लिख लिख मारे वैण।
अज लक्खां धीयां रोंदीयां, तैनू वारिस शाह नूं कैहण।
विभाजन की सीख
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस अनेक महत्वपूर्ण शिक्षाएं प्रदान करता है
सांप्रदायिकता किसी भी राष्ट्र को कमजोर कर सकती है। राजनीतिक स्वार्थ समाज में स्थायी विभाजन उत्पन्न कर सकते हैं। विविधता में एकता भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। संवाद और सहअस्तित्व ही स्थायी शांति का मार्ग हैं। इतिहास को भूलना नहीं चाहिए, बल्कि उससे सीखना चाहिए। लोकतंत्र और संविधान राष्ट्रीय एकता के सशक्त आधार हैं।
भावी संकल्पना: विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल स्मरण का अवसर नहीं, अपितु भविष्य निर्माण का आह्वान भी है।
समावेशी राष्ट्रवाद ऐसा राष्ट्रवाद जो सभी नागरिकों को समान सम्मान प्रदान करे और विविधताओं को राष्ट्रीय शक्ति के रूप में स्वीकार करे।
इतिहास का संतुलित अध्ययन युवाओं को इतिहास के तथ्यात्मक एवं संतुलित अध्ययन के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि वे अतीत की भूलों से सीख सकें।
सामाजिक सद्भाव विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं में सद्भाव, सहिष्णुता तथा संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए।
सांस्कृतिक संवाद भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए ताकि समाज में विश्वास और एकता मजबूत हो।
भारतविभाजन इतिहास की एक ऐसी त्रासदी है जिसने लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया और उपमहाद्वीप की सामूहिक चेतना पर अमिट छाप छोड़ी।समान विरासत, साझी संस्कृति, लगभग एक जैसा पहरावे तथा जीवनशैली वाले लोग आज 79 वर्ष बाद की पीड़ा के परिवेश से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए। शरणार्थी, रिफ्यूजी, मुहाजिर, बांग्लादेशी आदि शब्द एक अभिशाप की भांति अभी भी करोड़ों लोगों पर चिपका है। आतंकवाद, गरीबी, धार्मिक सहिष्णुता तथा प्राकृतिक आपदाओं से तीनों देश जूझ रहे हैं। आज इन तीनों पड़ोसी देशों के लोग एक दूसरे के घर में आना जाना कड़ी जांच पड़ताल के बिना संभव नहीं है।तीनों पड़ोसियों में से बीच वाला देश भारत है। उस पर दोहरी जिम्मेदारी भी है और दोहरी मार भी है। इस उपमहाद्वीप में अभी 79 वर्षीय पुरानी बातों को भुला पाना संभव नहीं हो पा रहा। भूगोल बदल सकता है, लेकिन इतिहास अभी तक अतीत की कटुस्मृतियों को मिटा नहीं पा रहा। 15 अगस्त, 1947 के पूर्व की स्थिति पूर्ववत नहीं हो सकती। वर्ष 1971 में उस भूखंड का और एक टुकड़ा अलग हुआ। भविष्य के गर्भ में क्या है, कुछ कहना संभव नहीं है, लेकिन घृणा और टकराव के क्रम जारी रहे, तो कुछ भी संभव है। अब इतना तो सुनिश्चित करना ही चाहिए कि भविष्य में इस उपमहाद्वीप में कोई ‘शरणार्थी ‘न हो।
‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ उन असंख्य ज्ञातअज्ञात लोगों को श्रद्धांजलि देने का अवसर है जिन्होंने विस्थापन, हिंसा और अपार कष्ट सहन किए।यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं बनता, अपितु साझा स्मृतियों, सांस्कृतिक एकता, पारस्परिक विश्वास और संवैधानिक मूल्यों से निर्मित होता है। विभाजन की पीड़ा को स्मृति में रखते हुए यदि हम सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता, लोकतांत्रिक चेतना और समावेशी विकास के मार्ग पर आगे बढ़ें, तो यही उन लाखों पीड़ितों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
अत विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस अतीत के घावों को कुरेदने का नहीं, अपितु उनसे सीख लेकर एक ऐसे भारत के निर्माण का संकल्प लेने का दिवस है, जो अधिक एकजुट, अधिक संवेदनशील, अधिक शक्तिशाली और अधिक विकसित हो और जहाँ विविधता विभाजन का कारण नहीं, अपितु राष्ट्रीय शक्ति का आधार बने।कभी कभी लगता है कि 1415 अगस्त को स्वाधीनता दिवस के साथ उसी शाम पूरे उपमहाद्वीप में पश्चाताप दिवस भी मनाया जाना चाहिए, जिससे करोड़ों परिवारों की नियति का स्मरण किया जाए तथा इतिहास की आत्मा से भविष्य के लिए सद्बुद्धि की याचना की जाए।
गौरीशंकर वैश्य विनम्र, लखनऊ
लोक दर्पण