
चमोली के पीपलकोटी में विष्णुगाड़पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग में हुआ दर्दनाक हादसा हिमालय में विकास और सुरक्षा के बीच बिगड़ते संतुलन की गंभीर चेतावनी है। इस संकट में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की तत्काल सक्रियता और मौके पर राहतबचाव की निगरानी सराहनीय है। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, सेना, आईटीबीपी, सीआईएसएफ, पुलिस तथा स्थानीय प्रशासन ने जिस तत्परता से अभियान चलाया, वह आपदा के बीच राज्य की सामूहिक क्षमता का प्रमाण है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सुरंग में इतनी तेजी से पानी और मलबा आया क्यों? प्रारंभिक रिपोर्टें भूस्खलन, भूधंसाव और भारी जलप्रवाह की ओर संकेत करती हैं। हिमालय की चट्टानों में दरारें, कमजोर भूस्तर, भूमिगत जलमार्ग, वर्षा और ढलान अस्थिरता ऐसे जोखिमों को बढ़ा सकते हैं। हालांकि इसे पूरी तरह प्राकृतिक दुर्घटना कहना उचित नहीं होगा। यदि ज्ञात जोखिम के बावजूद पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था न हो, तो आपदा का मानवीय आयाम बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसी परियोजना में दिसंबर 2025 में दुर्घटना से दर्जनों श्रमिक घायल हुए थे। उसके बाद मजिस्ट्रेट जांच और सुरक्षा ऑडिट के आदेश दिए गए थे। इस जैसी स्थिति का मॉक ड्रिल और अर्ली फ्लड वार्निंग सिस्टम का परीक्षण किया था। सवाल है कि उस दुर्घटना से मिले ये सबक जमीन पर उतरे या नहीं, ऐसे प्रावधान इस परियोजना में किस सीमा तक लागू थे। श्रमिकों की स्थिति और निकासी को लेकर शुरुआती भ्रम सामने आया है, ऐसे में कंपनी की कागजी तैयारी और वास्तविक सुरक्षा दावों के बीच अंतर की जांच जरूरी है।
सुरंगों में वेंटिलेशन, गैस और ऑक्सीजन की निगरानी, संचार, आपात निकासी और वैकल्पिक सुरक्षित मार्ग बुनियादी सुरक्षा आवश्यकताएं हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में कथित तौर पर ऑक्सीजन की कमी का आरोप सामने आया है। हालांकि जांच से पहले निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
2013 की केदारनाथ आपदा और 2021 की ऋ षिगंगाधौलीगंगा त्रासदी ने दिखाया है कि चमोली में प्राकृतिक जोखिम असाधारण हैं। 2021 की त्रासदी में लगभग 2.7 करोड़ घनमीटर चट्टान और बर्फ के विशाल द्रव्यमान के खिसकने से विनाशकारी मलबा प्रवाह बना था। ऐसे क्षेत्र में सुरंग, सड़क, बांध और पहाड़ कटान का हर फैसला सामान्य मैदानी इंजीनियरिंग के पैमाने से नहीं लिया जा सकता। अब जांच केवल हादसे के कारण बताने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। स्वतंत्र भूवैज्ञानिक और संरचनात्मक ऑडिट, श्रमिकों की वास्तविक उपस्थिति का डिजिटल रिकॉर्ड, अनिवार्य एस्केप मार्ग, 24 घंटे संचारवेंटिलेशन निगरानी, जलप्रवाह सेंसर, नियमित मॉक ड्रिल और जोखिम वाले हिस्सों में काम रोकने की बाध्यकारी व्यवस्था होनी चाहिए। ठेकेदार की लापरवाही सिद्ध हो, तो दंड के साथ परियोजना प्रबंधन की जवाबदेही भी तय हो। दुर्घटना के बाद जांच हमारी पुरानी प्रशासनिक परंपरा है, असली कसौटी यह होगी कि जांच से पहले चेतावनियों को क्यों नहीं सुना गया और जांच के बाद कितनी व्यवस्थाएं बदलीं। हिमालय को जीतने की नहीं, समझने की जरूरत है। विकास तभी टिकाऊ कहलाएगा, जब बिजली और सुरंग के साथ श्रमिक की जिंदगी को भी परियोजना की लागत का अनिवार्य हिस्सा माना जाए।
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