Varanasi News: संसद में 30 जुलाई को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा मनुस्मृति को लेकर उठाए गए विवाद के बाद देश के शीर्ष संतविद्वान समाज ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है. दिल्ली में हाल ही में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में यह निर्णय लिया गया है कि सनातन समाज की सामाजिक व्यवस्था के आधार ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ की प्रामाणिकता और इसमें कालक्रम में हुए कथित संशोधनों की वैज्ञानिक और विस्तृत समीक्षा की जाएगी.

इस बैठक में 8 आचार्य महामंडलेश्वर समेत कई मूर्धन्य विद्वान शामिल थे. काशी विद्वत परिषद, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद, अखिल भारतीय संत समिति और गंगा महासभा जैसे देश के शीर्ष धार्मिक संगठनों ने इस फैसले पर अपनी मुहर लगाई है.
वाराणसी के प्रसिद्ध रुद्राक्ष सभागार में 2 से 5 नवंबर के बीच चार दिवसीय ‘संस्कृति संसद’ का आयोजन होने जा रहा है, जिसमें भाग लेने के लिए दुनियाभर के विशिष्ट सनातनी जुटेंगे. संस्कृति संसद के पहले ही दिन बहुप्रतीक्षित और चिरप्रतीक्षित ‘हिंदू आचार संहिता’ को देश के सामने आधिकारिक रूप से प्रस्तुत किया जाएगा. मनुस्मृति की समीक्षा के लिए गठित होने वाली विद्वानों की समिति के प्रारूप और कार्यप्रणाली पर भी अंतिम फैसला इसी काशी की संस्कृति संसद में लिया जाएगा.
प्रो. राम नारायण द्विवेदी के बेबाक जवाब
मनुस्मृति की समीक्षा को लेकर श्री काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रोफेसर राम नारायण द्विवेदी ने Tv9 भारतवर्ष से विस्तृत बातचीत की. प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश:
सवाल 1: मनुस्मृति की समीक्षा करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
प्रो. राम नारायण द्विवेदी: “मनुस्मृति सनातनी सामाजिक व्यवस्था का मूल आधार है. लगभग 10,000 वर्ष पूर्व लिखी गई इस संहिता के माध्यम से समाज में वर्ण व्यवस्था के तहत एक अत्यंत संतुलित और सुंदर व्यवस्था की रचना की गई थी. लेकिन 1794 में विलियम जोन्स और उनकी 11 सदस्यीय समिति ने अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ की नीति के तहत जानबूझकर इसमें ऐसे श्लोक जोड़ दिए, जिससे हिंदू समाज में वैमनस्यता बढ़े. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। ऐसी मनगढ़ंत बातें जोड़ी गईं, जो मूल ग्रंथ में थीं ही नहीं.
अब काशी विद्वत परिषद के मार्गदर्शन में देश के सर्वोच्च धर्मशास्त्रियों और शीर्ष वेदाचार्यों की 11 सदस्यीय समिति बनेगी. यह समिति ब्रिटिश काल से पूर्व की भारतीय सामाजिक व्यवस्था और हजारों साल पुरानी मूल पांडुलिपियों का गहन अध्ययन करेगी. इसके लिए देश और दुनिया भर के पुस्तकालयों तथा पांडुलिपि संग्रहों को खंगाला जा रहा है.”
सवाल 2: 1794 में जोन्स ने ‘इंसटीट्यूट ऑफ लॉ’ लिखा. 225 साल बाद यह कैसे तय होगा कि मूल श्लोक कौनसा है और बाद में कौनसा जोड़ा गया?
प्रो. राम नारायण द्विवेदी: “हम मनुस्मृति की मूल पांडुलिपियां देश और विदेश दोनों जगहों पर खोज रहे हैं. अभी इस पर ज्यादा विवरण देना उचित नहीं होगा, लेकिन यह तय है कि चीन और दक्षिण भारत से मनुस्मृति की कुछ बेहद प्राचीन मूल पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं, जिनका विस्तृत अध्ययन चल रहा है. इस शोध कार्य में देश के कई प्रतिष्ठित संस्कृत विश्वविद्यालय और धर्मदर्शन संस्थान हमारा सहयोग कर रहे हैं.
हम देश को बताएंगे कि कैसे विलियम जोन्स के माध्यम से अंग्रेजों ने हिंदू समाज को नीचा दिखाने और आपस में लड़ाने के उद्देश्य से मनुस्मृति की व्याख्या को तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया था.”
सवाल 3: क्या आप नए सिरे से मनुस्मृति लिखने जा रहे हैं?
प्रो. राम नारायण द्विवेदी: “बिल्कुल नहीं! भगवान मनु हमारे लिए अत्यंत आदरणीय और पूजनीय हैं. उन्होंने मनुस्मृति के माध्यम से समाज को सही दिशा और मार्गदर्शन दिया था. हम मनुस्मृति को खारिज नहीं कर रहे हैं और न ही इसे नए सिरे से लिख रहे हैं.
हम मनुस्मृति से ‘विलियम जोन्स’ को खारिज कर रहे हैं. हम उन क्षेपक श्लोकों को हटा रहे हैं जिनकी वजह से समाज में नफरत फैलती है. मनुस्मृति में एक तरफ नारी सम्मान की बात लिखी है और दूसरी तरफ नारी के अपमान की बात, यह भला एक ही ग्रंथ में कैसे संभव है? इसलिए हम उन तमाम मनगढ़ंत तथ्यों को बाहर निकालेंगे, जिनकी आड़ लेकर इस पवित्र ग्रंथ को जलाने का प्रयास किया जाता है या समाज को बांटने के लिए इसका दुरुपयोग होता है.”