
नई दिल्ली: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पैलेट गन को लेकर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस पर लगातार तीखा हमला बोला है। उन्होंने मीडिया के सामने एक घायल छात्र को भी पेश किया और दावा किया कि छात्र को प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के छर्रे लगी, जिसकी वजह से उसे गंभीर चोटें आई हैं। वहीं, दूसरी ओर दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उसके पास पैलेट गन नहीं है और प्रदर्शन के दौरान ऐसे किसी हथियार का इस्तेमाल नहीं किया गया।
इस विवाद के दौरान पैलेट गन एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई है। ऐसे में यह जानना जरूरी है की आखिर ये पैलेट गन क्या होती है, भारत में इसका उपयोग कब शुरू हुआ, इसे कौन चला सकता है और कानून भीड़ नियंत्रण को लेकर क्या कहता है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, राहुल गांधी ने 20 जुलाई को दिल्ली में हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन इस्तेमाल किए जाने का आरोप लगाया। उन्होंने 19 वर्षीय छात्र साहिल का मामला उठाते हुए दावा किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से उसके चेहरे पर गंभीर चोट लगी, जिससे उसकी एक आंख की रोशनी स्थायी रूप से प्रभावित होने का खतरा है।
दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर भी कुछ प्रदर्शनकारियों ने पैलेट गन से घायल होने का दावा किया। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर फैक्ट चेक जारी करते हुए कहा कि पैलेट गन चलाने का दावा पूरी तरह भ्रामक है। पुलिस का कहना है कि उसके पास पैलेट गन उपलब्ध नहीं है और न ही उसका इस्तेमाल किया गया।
पैलेट गन क्या होती है?
पैलेट गन एक कम घातक हथियार मानी जाती है, जिससे एक साथ बड़ी संख्या में छोटेछोटे धातु के छर्रे निकलते हैं। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, एक शॉटगन कारतूस में लगभग 500 से 600 तक धातु के पैलेट हो सकते हैं।
ये छर्रे आमतौर पर सीसे की मिश्रधातु से बने होते हैं। फायर होने के बाद ये तेज गति से फैलते हैं और बड़े क्षेत्र में बिखर जाते हैं। यही कारण है कि एक निश्चित दूरी के बाद इनकी दिशा को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है और गंभीर चोट का खतरा बढ़ जाता है।
भारत में पैलेट गन कब आई?
भारत में पैलेट गन का उपयोग सबसे पहले विदेशों से आयात की गई गनों के जरिए शुरू हुआ। वर्ष 1992 में सीआरपीएफ की रैपिड एक्शन फोर्स के गठन के बाद इजराइल और बेल्जियम से पैलेट गन खरीदी गई थीं।
बाद में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की सहायता से इनका निर्माण भारत में शुरू हुआ। शुरुआती मॉडल सिंगलशेल लॉन्चर था, जिसे वर्ष 2011 में छह बैरल वाले मल्टी बैरल लॉन्चर में विकसित किया गया।
एक बार में कितने छर्रे दागे जा सकते हैं?
मल्टी बैरल लॉन्चर में छह से आठ शेल लगाए जा सकते हैं। एक शेल से लगभग 30 पैलेट निकलते हैं। यानी छह शेल दागे जाने पर कुछ ही सेकंड में 180 से अधिक छर्रे छोड़े जा सकते हैं।
इस हथियार का इस्तेमाल केवल रैपिड एक्शन फोर्स करती है। आरएएफ की 15 बटालियन हैं और प्रत्येक बटालियन में लगभग 100 पैलेट गन उपलब्ध होती हैं।
पैलेट गन पर सवाल उठने के बाद सरकार ने क्या किया?
पैलेट गन से होने वाली गंभीर चोटों पर उठे सवालों के बाद केंद्र सरकार ने 26 जुलाई 2016 को विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। समिति को इसके विकल्प तलाशने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
सरकार ने संसद में बताया था कि हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पैलेट गन अंतिम विकल्पों में शामिल है। इससे पहले PAVAChilli शेल, STUNLAC शेल, टियर स्मोक शेल और अन्य कम घातक साधनों का उपयोग किया जाता है।
क्या सीधे पैलेट गन चलाई जा सकती है?
सरकार के अनुसार, पैलेट गन का इस्तेमाल केवल गंभीर कानूनव्यवस्था की स्थिति में और तय मानक संचालन प्रक्रिया के तहत किया जाता है।
नीति के अनुसार, बल का उपयोग उतना ही किया जाना चाहिए जितना स्थिति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक हो। साथ ही नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा न्यूनतम नुकसान पहुंचाने पर जोर दिया जाता है।
क्या जवानों को विशेष ट्रेनिंग दी जाती है?
सरकार के मुताबिक, कम घातक हथियारों के उपयोग के लिए सुरक्षाकर्मियों को तीन दिन का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इसमें दंगा नियंत्रण, हथियार संचालन, फायरिंग अभ्यास और कानूनव्यवस्था की परिस्थितियों से निपटने की व्यावहारिक ट्रेनिंग शामिल होती है।
पैलेट के असर की जांच कैसे होती है?
चंडीगढ़ स्थित टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी में पैलेट के प्रभाव का परीक्षण बैलिस्टिक ग्रेड पारदर्शी जिलेटिन ब्लॉक पर किया जाता है। यह परीक्षण मानव शरीर के ऊतकों जैसी प्रतिक्रिया का आकलन करने के लिए किया जाता है।
हालांकि, सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए पैलेट की तकनीकी संरचना और चयन प्रक्रिया से जुड़ी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।
भीड़ नियंत्रण को लेकर कानून क्या कहता है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 148 के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट, थाना प्रभारी या उनकी अनुपस्थिति में कम से कम सबइंस्पेक्टर रैंक का अधिकारी गैरकानूनी भीड़ को हटने का आदेश दे सकता है।
यदि आदेश के बावजूद भीड़ नहीं हटती, तो कानून के तहत आवश्यक बल का प्रयोग किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर गिरफ्तारी भी की जा सकती है।
सशस्त्र बलों की मदद कब ली जाती है?
BNSS की धारा 149 के अनुसार, यदि सामान्य पुलिस बल से स्थिति नियंत्रित नहीं होती और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए जरूरी हो, तो जिला मजिस्ट्रेट या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट सशस्त्र बलों की सहायता ले सकता है।
कानून में स्पष्ट किया गया है कि ऐसी कार्रवाई के दौरान भी न्यूनतम आवश्यक बल का ही प्रयोग किया जाए और लोगों व संपत्ति को कम से कम नुकसान पहुंचे।
भीड़ नियंत्रण के लिए पुलिस के अन्य विकल्प
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, पुलिस राज्य का विषय है। राज्यों को दंगारोधी उपकरणों की खरीद के लिए केंद्र सरकार सहायता उपलब्ध कराती है। इनमें शामिल हैं—
- टियर गैस
- PAVA शेल
- चिली वाटर कैनन
- फुल बॉडी प्रोटेक्टर
- बुलेट रेजिस्टेंट जैकेट
- हेलमेट
- अन्य दंगारोधी उपकरण
इसके अलावा सुरक्षाबलों को नियमित मॉक ड्रिल और विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाता है।