कचरे से बनेगा पैसा… समझिए ‘गोबर इकोनॉमी’ का वो मास्टरप्लान, जो बदल सकता है किसानों और पशुपालकों की किस्मत!

कचरे से बनेगा पैसा… समझिए ‘गोबर इकोनॉमी’ का वो मास्टरप्लान, जो बदल सकता है किसानों और पशुपालकों की किस्मत!

Gobar dhan scheme: हमारे गांवों में सदियों से गोबर का एक ही काम माना जाता रहा है, खेतों में खाद डालना या फिर उपले बनाकर चूल्हा जलाना. शहरों में रहने वालों के लिए तो यह सिर्फ गंदगी का हिस्सा है. लेकिन अब नजरिया बदलने का वक्त आ गया है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने एक ऐसा फैसला लिया है, जो कचरे को सीधे कमाई में बदलने जा रहा है.

कचरे से बनेगा पैसा… समझिए ‘गोबर इकोनॉमी’ का वो मास्टरप्लान, जो बदल सकता है किसानों और पशुपालकों की किस्मत!

सरकार ने 23,731 करोड़ रुपये के भारीभरकम बजट के साथ ‘गोबरधन योजना’ को मंजूरी दे दी है. यह कोई आम सरकारी घोषणा नहीं है, बल्कि देश के ऊर्जा सेक्टर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का पूरा गियर बदलने की तैयारी है. इस फैसले के बाद, आपके घर या गांव का जैविक कचरा और गोबर अब एक बहुत बड़े व्यापार का रूप लेने जा रहा है.

गोबर इकोनॉमी है क्या और कैसे काम करती है?

गोबर इकोनॉमी का मतलब सिर्फ खेतीकिसानी नहीं है. यह ग्रीन एनर्जी, वेस्ट मैनेजमेंट और गांव में नए उद्योग लगाने का एक पूरा चक्र है. इसे ऐसे समझिए, गांवों में किसानों और पशुपालकों से गोबर और खेती का कचरा इकट्ठा किया जाएगा. इसके लिए कलेक्शन सेंटर या ‘गोबर बैंक’ बनाए जाएंगे. इस कचरे को बिना ऑक्सीजन के सड़ाकर एक खास प्लांट में डाला जाएगा. इससे मीथेन गैस बनेगी, जिसे हम कंप्रेस्ड बायोगैस कहते हैं.

गैस निकलने के बाद जो माल बचेगा, वह बेहतरीन दर्जे की जैविक खाद होगी. यानी कचरा एक, लेकिन उससे होने वाली कमाई के कई रास्ते. इसी कचरे से मशीनों के जरिए ‘गोकास्ट’ भी बनता है, जो लकड़ी का एक शानदार विकल्प है और श्मशान घाटों या कारखानों में काम आता है.

सरकार को इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि सरकार को अचानक गोबर और कचरे से गैस बनाने की इतनी फिक्र क्यों हो रही है? इसका जवाब अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हमारी मजबूरी में छिपा है. केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने साफ बताया है कि भारत अपनी जरूरत की 50 फीसदी प्राकृतिक गैस विदेशों से खरीदता है.

हाल ही में दुनिया भर में जो युद्ध और तनाव के हालात बने, उससे ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ का समुद्री रास्ता प्रभावित हो गया. इसी रास्ते से भारत का लगभग 60 फीसदी LNG गैस आता है. सरकार को समझ आ गया है कि ऊर्जा के लिए हमेशा दूसरे देशों के भरोसे रहना खतरनाक है. इसलिए, देश के भीतर मौजूद कचरे से सीबीजी बनाकर इस निर्भरता को खत्म करने का मास्टरप्लान तैयार किया गया है.

आपका माल खरीदेगा कौन?

जब भी कोई नया बिजनेस शुरू होता है, तो सबसे बड़ा डर बाजार का होता है. माल बन गया, पर बिका नहीं तो क्या होगा? सरकार ने इस योजना में इस डर को जड़ से खत्म कर दिया है. सरकार खुद आपकी गैस की पक्की ग्राहक होगी. जो सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां शहरों में पेट्रोल पंप पर सीएनजी और घरों में पीएनजी सप्लाई करती हैं, उनके लिए यह गैस खरीदना अनिवार्य कर दिया गया है. नियम बना दिया गया है कि इन कंपनियों को 202627 में अपनी कुल गैस का 3 फीसदी हिस्सा इन्ही सीबीजी प्लांट वालों से खरीदना होगा. अगले सालों में यह टारगेट 4 और 5 फीसदी तक बढ़ा दिया जाएगा.

भाव की टेंशन खत्म, दस साल तक रेट फिक्स

बाजार में भाव रोज ऊपरनीचे होते हैं, लेकिन सरकार ने सीबीजी गैस का रेट 10 साल के लिए फिक्स कर दिया है. उत्पादकों को 2,110 रुपये प्रति MMBTU का भाव मिलेगा. यानी प्लांट लगाने वाले को पहले दिन से पता होगा कि उसकी कितनी कमाई होने वाली है और अगले 10 साल तक उसे भाव गिरने की कोई चिंता नहीं सताएगी.

प्लांट लगाने के लिए खजाना खोल रही है सरकार

सीबीजी प्लांट लगाना कोई छोटीमोटी दुकान खोलने जैसा नहीं है, इसमें करोड़ों का खर्च आता है. इस बोझ को कम करने के लिए सरकार भारी सब्सिडी यानी पूंजीगत सहायता दे रही है. क्षमता के हिसाब से प्रति टन, प्रति दिन 2 करोड़ रुपये तक की सीधी मदद मिलेगी.

इतना ही नहीं, आपके प्लांट से लेकर शहर की मुख्य गैस पाइपलाइन तक गैस पहुंचाने का पूरा नेटवर्क भी सरकार खुद बिछवाएगी. अगर आप पहली बार ऐसा प्लांट लगा रहे हैं या आप महिला उद्यमी हैं, तो बैंक से लोन लेने में भी दिक्कत नहीं होगी. सरकार खुद आपके लोन की गारंटी लेगी, जिससे बैंक आपको आसानी से और सस्ते ब्याज पर पैसा दे सकेंगे.

गैस से तो कमाई होगी ही, खाद देगी डबल मुनाफा

इस पूरे बिजनेस मॉडल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसमें कुछ भी बेकार नहीं जाता. गैस प्लांट से गैस निकलने के बाद जो गाढ़ा तरल या सूखा माल बचता है, वह मिट्टी के लिए संजीवनी है. इसे प्रीमियम जैविक खाद कहते हैं. प्लांट का मालिक गैस बेचकर तो सरकारी रेट पर पैसे कमाएगा ही, साथ ही इस बची हुई खाद को किसानों को बेचकर अपना मुनाफा दोगुना कर लेगा. यह खाद खेतों की पैदावार बढ़ाएगी और रासायनिक खाद का खर्च बचाएगी.

यह योजना वित्त वर्ष 202627 से 203536 तक पूरे दस साल चलेगी. साफ है कि सरकार का लक्ष्य सिर्फ कचरा साफ करना नहीं है, बल्कि कचरे से ऊर्जा बनाकर भारत को आत्मनिर्भर बनाना और गांव के लोगों की जेब में सीधा पैसा पहुंचाना है. यह गोबर इकोनॉमी आने वाले वक्त में भारतीय अर्थव्यवस्था की एक नई रीढ़ साबित होने वाली है.

कितना बड़ा है गोबर का यह खजाना?

पशुपालन मंत्रालय की 2019 की पशु गणना के मुताबिक, हमारे देश में 30 करोड़ से ज्यादा मवेशी हैं. इनमें 19.25 करोड़ गाएं और करीब 11 करोड़ भैंसें हैं. एक अनुमान के मुताबिक, एक आम देसी गाय दिन भर में औसतन 10 किलो गोबर देती है, जबकि अन्य नस्ल की गाएं और भैंसें 20 से 25 किलो तक गोबर कर देती हैं. अगर इसे ऊर्जा में बदलने का गणित देखें, तो सिर्फ 20 किलो गोबर से 1 मेगाजूल एनर्जी तैयार की जा सकती है. करोड़ों मवेशियों से मिलने वाले इस अपार गोबर से बड़े पैमाने पर गैस और ऊर्जा बनाई जा सकती है. चूंकि देश के सबसे ज्यादा मवेशी गांवों में ही पलते हैं, इसलिए इस ‘गोबर इकोनॉमी’ का सबसे बड़ा आर्थिक फायदा भी सीधे गांव वालों और पशुपालकों की जेब में ही जाएगा.

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