
अब वे दिन गए जब यह कहा जाता था कि मॉडर्न साइंटिफिक रिसर्च की जन्मभूमि अमेरिका है और अमेरिका का साइंटिफिक रिसर्च बेस यूरोपियन वैज्ञानिकों की देन है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में वैज्ञानिक शोध का केंद्र धीरेधीरे अमेरिका से आगे बढ़कर भारत और चीन जैसे देशों की ओर भी देख रहा है। इसके पीछे वैज्ञानिक प्रतिभा, संस्थागत क्षमता, सरकारी निवेश और तकनीकी आत्मनिर्भरता जैसे कई कारण हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मिजाज और उनकी नीतियों ने अमेरिकी साइंटिफिक कम्युनिटी के एक बड़े हिस्से को नाराज किया है। अमेरिका के अनेक संस्थानों और विश्वविद्यालयों में बाहरी देशों के वैज्ञानिक बड़ी संख्या में काम करते हैं। इनमें से अनेक को अमेरिकी नागरिकता भी प्राप्त है। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इसके बावजूद इन वैज्ञानिकों पर अमेरिकी जासूसी संस्थाओं और फेडरल पुलिस की निगरानी रहती है, खासतौर से रूस, उत्तर कोरिया और चीन से उनके संबंधों तथा विदेशी यात्राओं को लेकर।
हाल ही में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित उमर याघी ने अमेरिका छोड़कर चीन में बसने का इरादा जताया है। अमेरिका में चीनी मूल के बड़ी संख्या में वैज्ञानिक और शोधार्थी हैं। इनमें से कुछ को बाहर का रास्ता दिखाया गया और कुछ को वैज्ञानिक सामग्री चीन भेजने या ले जाने के आरोप में मुकदमों का सामना करना पड़ा। विश्व की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिकाएं ऐसी खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित करती रही हैं। कुछ समय के लिए हलचल मचती है और फिर मामला शांत हो जाता है। लेकिन उमर याघी का चीन जाने का निर्णय ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका में विज्ञान के लिए फंडिंग में कटौती की चर्चा है और चीन दुनिया भर के बेहतरीन वैज्ञानिक टैलेंट को अपने यहां आकर्षित करने में जुटा है। याघी ने बीजिंग की सिंघुआ यूनिवर्सिटी में रिसर्चर के रूप में फुलटाइम नौकरी स्वीकार की है।
चीन इस समय वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में एक अग्रणी देश बन चुका है। वहां की सरकार रेयर अर्थ मैटेरियल्स, अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर तकनीक और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में जबरदस्त निवेश कर रही है। इसके लिए उसे हजारों वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की आवश्यकता है। उमर याघी जैसे वैज्ञानिक इस प्रक्रिया की शुरुआत का संकेत हो सकते हैं। यदि यह सिलसिला जारी रहता है तो अमेरिका की प्रशासनिक नीति क्या होगी, यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन उच्च स्तर की प्रतिभा का ऐसा पलायन किसी भी देश के लिए चिंता का विषय तो है ही।
उमर याघी यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले में केमिस्ट्री के प्रोफेसर हैं। उन्हें मेटलऑर्गेनिक फ्रेमवर्क्स पर उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए 2025 का केमिस्ट्री का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया। वे बर्कले ग्लोबल साइंस इंस्टीट्यूट के फाउंडिंग डायरेक्टर भी हैं। उनका उद्देश्य विकासशील देशों में रिसर्च सेंटर स्थापित करना है। इसके अलावा वे कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों से भी जुड़े रहे हैं। ऐसे वैज्ञानिक का अपना भविष्य चीन में तलाशना अमेरिका के लिए सामान्य घटना नहीं मानी जा सकती।
भारत के संदर्भ में देखें तो 1960 से लेकर 2000 के बीच प्रतिभा पलायन में संख्यात्मक इजाफा हुआ था और सरकार चिंतित हुई थी। तब यह तर्क भी दिया जाता था कि ‘ब्रेन ड्रेन इज बेटर दैन ब्रेन इन द ड्रेन।’ राष्ट्रवादी सोच के लिए यह कथन भले ही अवमाननापूर्ण था, लेकिन सच्चाई यह थी कि हम अपनी प्रतिभाओं को रोकने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक संस्थागत इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने में नाकाम रहे थे।
1985 तक भी हमारे वैज्ञानिक उच्च स्तर की इंस्ट्रूमेंटेशन और आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों की स्वदेशी उपलब्धता के लिए संघर्ष कर रहे थे। इसके बावजूद सैकड़ों प्रतिभाशाली वैज्ञानिक भारत में रहकर और जरूरत पड़ने पर विदेशी संस्थानों में कुछ समय के लिए प्रशिक्षण लेकर देश लौटना चाहते थे। वे केमिस्ट्री, फिजिक्स, एस्ट्रोनॉमी एवं एस्ट्रोफिजिक्स और बायोलॉजिकल साइंसेज में उन्नत शोध करना चाहते थे।
1985 के बाद परिस्थितियां तेजी से बदलने लगीं। सरकारी निवेश बढ़ा और अनेक नए वैज्ञानिक संस्थानों की स्थापना हुई। वरिष्ठ और उभरते वैज्ञानिकों को देश में शोधकार्य बढ़ाने तथा उन्नत तकनीक विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई। निजी क्षेत्र में भी प्रतिभाशाली लोगों ने औद्योगिक संस्थान खड़े किए, जो आज अग्रणी उद्योग बन चुके हैं। इन प्रयासों से भारत में प्रतिभा पलायन काफी हद तक रुका, लेकिन चिंता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
भारत में साइंटिफिक मैनपावर के नियमन की प्रारंभिक नीतियां काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च से शुरू हुईं और बाद में डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी तथा प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय की भूमिका महत्वपूर्ण हुई। उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाने पर कोई रोक नहीं है, बल्कि भारत ने अनेक देशों के साथ वैज्ञानिक सहयोग के समझौते किए हैं। उद्देश्य यही है कि भारतीय वैज्ञानिक वैश्विक ज्ञान से जुड़ें और उनकी विशेषज्ञता का लाभ देश को भी मिले।
साइंटिफिक रिसर्च को टेक्नोलॉजी और एप्लीकेशन्स तक पहुंचाने में बीसतीस वर्ष का समय, मानवीय प्रतिभा और अपार धनराशि लगती है। इसके परिणाम तत्काल नहीं मिलते और लगातार राजनीतिक एवं संस्थागत समर्थन की जरूरत होती है। भारत ने उपग्रह, रॉकेट, परमाणु ऊर्जा, रक्षा तकनीक और पनडुब्बियों से लेकर अनेक आधुनिक क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमता विकसित की है। अब शायद ही कोई ऐसा प्रमुख क्षेत्र बचा हो, जिसमें भारतीय संस्थान वैश्विक संस्थानों के साथ प्रतिस्पर्धा की स्थिति में न हों।
इसलिए आने वाला समय केवल अमेरिका या यूरोप का वैज्ञानिक समय नहीं है। चीन ने प्रतिभा और निवेश के बल पर अपनी स्थिति मजबूत की है, जबकि भारत के पास विशाल युवा वैज्ञानिक शक्ति, बढ़ता संस्थागत आधार और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में स्पष्ट प्रयास हैं। यदि दोनों देश प्रतिभाओं को बेहतर शोध वातावरण, स्वतंत्रता, संसाधन और सम्मान दे सके, तो भविष्य के वैज्ञानिक शोध का बड़ा हिस्सा निश्चित रूप से भारत और चीन में आकार ले सकता है।
रणबीर सिंह, विज्ञान लेखक