Quick Samachar: नई दिल्ली: साल 2011 में जापान में आया 9.0 तीव्रता का तोहोकु भूकंप इतिहास की सबसे भयानक प्राकृतिक आपदाओं में से एक था. इस भूकंप ने न सिर्फ भारी तबाही मचाई बल्कि पृथ्वी के अंदर एक ऐसी हलचल पैदा की जो अब सामने आई है. एक नई रिसर्च में साइंटिस्ट्स ने बेहद चौंकाने वाला दावा किया है. भूकंप के दौरान पैदा हुई एक सिस्मिक वेव जमीन के अंदर 2900 किलोमीटर गहराई तक गई. यह वेव पृथ्वी के मेंटल और लिक्विड आउटर कोर की बाउंड्री से टकराकर वापस सतह पर लौट आई. इस खतरनाक लहर के वापस आने से पूरा जापान पूरब की तरफ 5.5 मिलीमीटर तक खिसक गया था. यह हैरान करने वाली घटना मुख्य भूकंप के ठीक 13 मिनट बाद हुई थी. यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के साइंटिस्ट्स की इस खोज ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है. यह पहली बार है जब इतनी गहराई से लौटकर आई किसी लहर ने जमीन को खिसकाया है.

महाविनाशकारी भूकंप के 13 मिनट बाद पृथ्वी के कोर से टकराकर लौटी लहर, खिसक गया पूरा जापान!​

पृथ्वी के कोर से टकराकर वापस लौटने वाली ScS वेव क्या है?
भूकंप के समय जमीन के अंदर कई तरह की तरंगें पैदा होती हैं. इन्हें साइंटिस्ट्स सिस्मिक वेव कहते हैं. तोहोकु भूकंप इतना शक्तिशाली था कि इसने पृथ्वी के अंदर गहरे शॉकवेव्स भेजे. इनमें से एक खास शियर वेव थी जिसे साइंस की भाषा में ScS वेव कहा जाता है.

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यह वेव जमीन के नीचे लगभग 2900 किलोमीटर तक का सफर तय करके कोरमेंटल बाउंड्री तक पहुंची. वहां से यह वेव रिफ्लेक्ट होकर वापस ऊपर की तरफ आई.

इस पूरी यात्रा में तरंग ने कुल 5800 किलोमीटर की दूरी तय की. यह दूरी लगभग पृथ्वी के रेडियस यानी त्रिज्या के बराबर है. जब यह वेव वापस सतह पर पहुंची तो इसने जापान के जीपीएस नेटवर्क में अजीब हलचल पैदा कर दी.

वैज्ञानिकों ने पाया कि इस वेव का असर सिर्फ जापान तक सीमित नहीं था बल्कि चीन के सिस्मोमीटर ने भी इसे रिकॉर्ड किया था. यह वेव अपने साथ भारी मात्रा में एनर्जी लेकर वापस लौटी थी.

जापान के जीपीएस नेटवर्क ने वैज्ञानिकों को क्या हैरान करने वाला डेटा दिया?
जापान के पास जीयॉनेट नाम का एक बेहद एडवांस अर्थ ऑब्जर्वेशन नेटवर्क सिस्टम है. इस सिस्टम में पूरे देश में लगभग 1200 से ज्यादा जीपीएस इंस्ट्रूमेंट्स लगे हैं. ये इंस्ट्रूमेंट्स हर 20 किलोमीटर की दूरी पर सेट किए गए हैं. इनका काम जमीन की मामूली हलचल को भी ट्रैक करना है.

जब कोर से टकराकर लौटी वेव जापान पहुंची तो इन जीपीएस स्टेशन्स ने अजीब डेटा रिकॉर्ड किया. डेटा के मुताबिक जापान का एक बड़ा हिस्सा अचानक पूरब की तरफ शिफ्ट हो गया था. सबसे तेज हलचल भूकंप के केंद्र के पास वाले इलाकों में देखी गई जहां जमीन 5.5 मिलीमीटर से ज्यादा खिसक गई.

चुबू और चुगोकू रीजन में भी 4 मिलीमीटर से ज्यादा की शिफ्टिंग दर्ज हुई. यहां तक कि भूकंप के केंद्र से 1300 किलोमीटर दूर स्थित दक्षिणी हिस्सों में भी 2 से 3 मिलीमीटर का बदलाव देखा गया. पहले साइंटिस्ट्स को लगा कि यह डेटा प्रोसेसिंग की कोई गलती है. लेकिन बारबार जांच करने के बाद भी यह बदलाव बिल्कुल सच साबित हुआ.

एक कमजोर दिखने वाली लहर ने दो टेक्टोनिक प्लेट्स को कैसे खिसका दिया?
जापान प्रशांत महासागर की एक बेहद संवेदनशील फॉल्ट लाइन पर स्थित है. यहां पैसिफिक टेक्टोनिक प्लेट लगातार ओखोटस्क प्लेट के नीचे धंस रही है. इसे सबडक्शन जोन कहा जाता है. तोहोकु भूकंप इसी प्लेट बाउंड्री के अचानक खिसकने से आया था. जब कोर से टकराकर लौटी शियर वेव वापस आई तो उसने एक और हलचल शुरू कर दी.

साइंटिस्ट्स के मुताबिक यह वेव बहुत ज्यादा मजबूत नहीं थी लेकिन यह पूरे जापान में एक साथ पहुंची. इस सिंक्रोनाइज्ड पल्स ने प्लेट बाउंड्री पर एक जेंटल शोव यानी हल्का सा धक्का दिया. यह धक्का उन फॉल्ट्स पर लगा जो मुख्य भूकंप के कारण पहले से ही भारी तनाव में थे.

इस हल्के धक्के की वजह से प्लेट्स के बीच एक बड़ा स्लिप इवेंट हो गया. इस स्लिप ने भले ही कोई बड़ा भूकंप नहीं लाया लेकिन इसने जमीन को हमेशा के लिए खिसका दिया.

इस गुप्त स्लिप इवेंट में कितनी विनाशकारी ऊर्जा छिपी हुई थी?
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की साइंटिस्ट सुनयांग पार्क ने इस रिसर्च का नेतृत्व किया है. उनके कंप्यूटर मॉडल्स ने इस पूरी घटना के पीछे के सच को उजागर किया है.
सुनयांग पार्क ने कहा, ‘यह पहली बार है जब इतनी विशाल दूरी तय करने वाली किसी लहर ने जमीन पर नया भूकंपीय इवेंट ट्रिगर किया है.’

पार्क के मुताबिक इस स्लिप इवेंट ने कुल मिलाकर उतनी एनर्जी रिलीज की जितनी एक 7.5 तीव्रता के बड़े भूकंप में होती है. लेकिन अच्छी बात यह रही कि यह एनर्जी किसी एक झटके में रिलीज नहीं हुई.

यह एनर्जी एक बहुत बड़े इलाके में धीरेधीरे फैल गई. इसी वजह से सतह पर रहने वाले लोगों को कोई बड़ा झटका महसूस नहीं हुआ. लेकिन जमीन के नीचे टेक्टोनिक प्लेट्स में मिलीमीटर से लेकर सेंटीमीटर तक का मूवमेंट हो गया.

इस घटना ने साइंटिस्ट्स को सोचने पर मजबूर कर दिया है. अब तक माना जाता था कि मुख्य भूकंप के बाद सिर्फ आफ्टरशॉक्स का खतरा होता है. लेकिन यह स्टडी बताती है कि पृथ्वी की गहराई से लौटने वाली तरंगें भी बड़ा खतरा बन सकती हैं.

भविष्य के भूकंपों के लिए इस नई खोज के क्या मायने हैं?
यह रिसर्च साइंस जर्नल में पब्लिश हुई है और इसने सिस्मिक हैजर्ड यानी भूकंपीय खतरों के एक नए रूप को सामने रखा है. साइंटिस्ट्स का कहना है कि मुख्य भूकंप के बीत जाने के कई मिनटों बाद भी खतरा टलता नहीं है. पृथ्वी के कोर से टकराकर लौटने वाली तरंगें शांत पड़ चुके फॉल्ट्स को दोबारा एक्टिवेट कर सकती हैं. यह एक ऐसा छुपा हुआ खतरा है जिसे अब तक नजरअंदाज किया जा रहा था.

भविष्य में आने वाले बड़े भूकंपों की मॉनिटरिंग के लिए यह खोज बेहद जरूरी साबित होगी. अब साइंटिस्ट्स को भूकंप के बाद सिर्फ सतह की हलचल पर ही नहीं बल्कि पृथ्वी के अंदर से लौटने वाली गूंज पर भी नजर रखनी होगी. इससे आपदा प्रबंधन और भूकंप की भविष्यवाणी करने वाले सिस्टम को और ज्यादा सटीक बनाने में मदद मिलेगी.

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