उत्तर प्रदेश में अगले साल यानी 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों की गहमागहमी तेज हो गई हैं. चुनाव की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी ने बुंदेलखंड में एक बड़ा सियासी दांव खेल दिया है. बांदाचित्रकूट लोकसभा सीट से 2024 में बसपा के प्रत्याशी रहे मयंक द्विवेदी को सपा ने अपने खेमे में खामिल कर लिया है. मयंक द्विवेदी के सपा में शामिल होने के साथ ही जहां सपा का कुनबा मजबूत हुआ है, वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती को बुंदेलखंड में बड़ा झटका लगा है.

मयंक द्विवेदी ने लखनऊ स्थित सपा कार्यालय में पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में सपा का दामन थाम लिया है. उनके सपा में शामिल की घटना सपा और बसपा दोनों के लिए खास अहमियत रखती है. खासतौर पर सपा को बुंदेलखंड में बड़ा ब्राह्मण चेहरा मिल गया है, वहीं इस इलाके में बसपा की सोशल इंजीनियरिंग बिखरती नजर आ रही है. माना जा रहा है कि मयंक द्विवेदी इस इलाके में खासा रसूख रखते है.
कौन हैं मयंक द्विवेदी?
मयंक द्विवेदी लंबे समय से बांदाचित्रकूट की स्थानीय राजनीति में सक्रिय हैं. वह दो बार जिला पंचायत सदस्य रह चुके हैं. उनके परिवार का बसपा से पुराना राजनीतिक जुड़ाव रहा है. उनके पिता स्वर्गीय पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी नरैनी विधानसभा सीट से 2007 में बसपा के टिकट पर जीतकर विधायक रह चुके हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने मयंक द्विवेदी को बांदाचित्रकूट लोकसभा सीट से मैदान में उतारा था. अब विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले उनका सपा में जाना स्थानीय राजनीति में नई चर्चा को जन्म दे रहा है.
सपा को क्या मिला?
मयंक द्विवेदी की एंट्री से सपा को बुंदेलखंड में एक प्रमुख ब्राह्मण चेहरा मिल गया है. माना जा रहा है कि इससे संगठन और चुनावी राजनीति को धार देने का मौका मिलेगा. बांदा और चित्रकूट जैसे इलाकों में पार्टी पहले से संगठन को मजबूत करने की कवायद में जुटी है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। माना जा रहा है कि मयंक द्विवेदी नराइनी विधानसभा सीट से मैदान में उतार सकती है. उनका पार्टी बदलने का अर्थ सिर्फ एक नेता के पाला बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि बुंदेलखंड में बसपा के पुराने सामाजिक आधार और स्थानीय नेतृत्व पर भी सवाल खड़े करता है.
बुंदेलखंड पर अखिलेश की नजर
2027 के चुनावों को लेकर हो रही गुणा गणित में बुंदेलखंड महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र है. सपा की रणनीति में बुंदेलखंड पर फोकस पहले से है. मयंक द्विवेदी से पहले पूर्व मंत्री राम आसरे कुशवाहा भी बीजेपी छोड़कर सपा में लौट चुके हैं. ऐसे में बुंदेलखंड और उससे जुड़े इलाकों में अलगअलग सामाजिक समूहों के नेताओं को साथ लाने की कोशिश के तौर पर इन घटनाक्रमों को देखा जा सकता है.