Quick Samachar: अकबर की तरह ही औरंगज़ेब ने भी हिंदुस्तान पर तक़रीबन 49 साल शासन किया. हालांकि, राज्य की सीमाओं के विस्तार के मामले में उसने अकबर को पीछे छोड़ा. लेकिन अकबर ने जहां सुदृढ़ शासन व्यवस्था और सुलह कुल के रास्ते चल मुल्क में अमनचैन कायम किया, उसके उलट औरंगजेब ने लगातार युद्धों में उलझकर मुल्क और खजाने की माली हालत बदतर कर दी. मज़हबी कट्टरता, हिंदुओं पर जजिया कर और मंदिरों के ध्वंस की उसकी नीति ने बहुसंख्यक आबादी को नाराज किया. बेशक अपनी जिंदगी में वह गद्दी पर मजबूती से डटा रहा लेकिन उसने मुगल साम्राज्य के पतन का रास्ता खोल दिया.

तख्तएताउस की चाहत में पिता शाहजहां को क़ैद और रास्ते के कांटे तीन भाइयों दारा, मुराद और शुजा का बेरहमी से सफाया करने वाले औरंगज़ेब को इतिहास के सबसे निरंकुश शासक के तौर पर याद किया जाता है. पर वही औरंगज़ेब अपने आख़िरी दिनों में खुद को कितना अकेला और असहाय पा रहा था, इसका हाल बेटों को लिखी उसकी चिट्ठियां और वसीयत बयान करती हैं. पढ़िए उन्हीं के कुछ अंश.
अकेले आया, अब पाप की गठरी साथ
अपने बेटे आज़म को औरंगजेब ने लिखा, ” बुढ़ापा आ गया है और कमजोरी बहुत बढ़ गई है. शरीर काम नहीं कर रहा. अकेला आया था और अकेला ही जा रहा हूं. खुदा की इबादत के अलावा जो भी वक्त बिताया, उसमें रंज के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ. न सल्तनत पर सच्ची हुकूमत कर पाया और न रियाया का ख़्याल रख पाया. कीमती जिंदगी बेकार गई.”
ब्रिटिश म्यूज़ियम में उपलब्ध औरंगजेब के इस हस्तलिखित पत्र का मशहूर इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने उस पर केंद्रित अपनी किताब में हवाला दिया है. आगे उसने लिखा, “मेरा बुखार उतर गया है और पीछे रह गए हैं, सिर्फ यह चमड़ी और ऊपरी भूसा. इस दुनिया में अपने साथ कुछ नहीं लाया था. पर अब साथ पापों की गठरी ले जा रहा हूँ. नहीं पता कि मुझे क्या सजा मिलने वाली है? लेकिन ख़ुदा से रहम की पूरी उम्मीद है.”
औरंगजेब को मुगल साम्राज्य का सबसे क्रूर बादशाह कहा गया.
किसी पर भरोसा न करो
दूसरे बेटे कामबख्श को इसी दौरान लिखी एक अन्य चिठ्ठी में भी उसने अपनी बेचारगी जाहिर की. आपस में झगड़ते बेटों और साम्राज्य के पतन की आशंका उसे परेशान किए हुए थी. उसने लिखा, “हर मुमकिन कोशिश की. लेकिन किसी ने मेरी नहीं सुनी. खुदा को नहीं मंजूर था. अब कहने से क्या फायदा! जो पाप कुकर्म मैंने किए, उसका बोझ खुद ही ले जाऊंगा. मेरे अंगों का हिलनाचलना भी बंद हो गया है. जो सांस निकल जाती है, उसके वापस आने की उम्मीद नहीं रही. तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को ख़ुदा के भरोसे छोड़ता हूंं. दुनियावी लोग धोखा देते हैं. उन पर आंखें मूंदकर भरोसा न करना.”
चिठ्ठी में भी अपने भाई दारा जिसे उसने बहुत बेरहमी से कत्ल कराया था, का जिक्र किया और लिखा कि उसने ठीक इंतजाम नहीं किए, इसलिए नाकाम रहा. बेटे को नसीहत दी, ” अपनी सीमाओं में ही पांव पसारो. इस बात का ध्यान रखो कि किसान और प्रजा बर्बाद न हों और मुसलमान न मारे जाएं. नहीं तो इन सबकी सजा मुझे भुगतनी होगी.”
छत्रपति संभाजीनगर में बना औरंगजेब का मकबरा. फोटो: PTI
दारा को मारने के बाद भी भुला न पाया
औरंगज़ेब की मौत के बाद तकिये के नीचे से उसके हाथों लिखी वसीयत मिली थी. आगे गद्दी पर कौन बैठेगा, इसका उसने अपनी ओर से कोई फैसला नहीं किया था. इसकी जगह उसने लिखा कि जो कोई सम्राट बने, वह बाकी भाइयों में सूबों का बंटवारा कर दे ताकि जंग और मौतें न हों. इस वसीयत में उसने अपने वारिसों को बारह नसीहतें दीं और उम्मीद जाहिर की कि वे इसे मानेंगे. इन्हें लिखते समय उसके दिलदिमाग पर अपने पिता शाहजहां और भाई दारा शिकोह के प्रति उनके अतिरिक्त प्रेम की शिकायत हावी थी.
उसने लिखा, “कभी अपने पुत्रों पर भरोसा न करो और न उनसे नजदीकी जाहिर करो. क्योंकि अगर सम्राट शाहजहां ने दारा शिकोह के लिए ऐसी तरफदारी न दिखाई होती तो उसका इतना तकलीफदेह अंत न होता.”
शासक के लिए घूमना और चौकन्ना रहना जरूरी
कामयाब शासक बनने के लिए औरंगज़ेब ने अपनी वसीयत में वारिसों को तज़बीज़े भी सुझाईं थीं. सम्राट को लगातार इधरउधर घूमते रहना चाहिए. किसी एक जगह बहुत ज्यादा दिन नहीं ठहरना चाहिए. एक जगह रुकने पर जाहिर तौर पर आराम मिलेगा लेकिन हजार मुसीबतें सिर पर आ पड़ेगी. साम्राज्य के हर इलाके की हर खबर जल्दी से जल्दी जानकारी में आनी चाहिए. हमेशा चौकन्ना रहना जरूरी है. मेरी जरा सी लापरवाही से शिवाजी कैद से निकल भागा, नतीजतन आखिर तक मुझे मराठों से जूझना पड़ा. औरंगजेब ने शासन के लिए ईरानी मुलाजिमों और लड़ने के लिए तूरानी सैनिकों को सबसे भरोसेमंद बताया है. बारहा के सैय्यदों को उसने पूज्य बताया और उनके प्रति कुरान की आयत के मुताबिक सम्मान के सलूक की सीख दी. उन सेवकोंसैनिकों के प्रति जो मुश्किल हालात में भी उसके साथ बने रहे, उनके प्रति दयापूर्ण व्यवहार और अगर उनसे कोई गलती भी हुई उन्हें माफ करने के लिए भी उसने लिखा था.
टोपियों की कमाई से किया कफ़न का इंतजाम
औरंगज़ेब नहीं चाहता था कि उसकी मौत से जुड़ा कोई खर्च शाही खजाने से किया जाए. इस काम को सादगी से किए जाने की भी उसकी हिदायत थी. उसने लिखा, ” अन्याय में डूबे हुए मुझ पापी की कब्र को वहां चढ़ाए गए कपड़े से ढंक देना. इस काम को पूरा करने के साधन शहजादे आज़म के पास हैं और उनसे हासिल कर लिए जाएं. मेरी सी हुई टोपियों से बचे चार रुपए और दो आने महालदार आला बेग के पास जमा हैं. उससे लेकर कफ़न में खर्च करें. कुराननक़ल से कमाए गए तीन सौ पांच रूपये मेरे बटुए में हैं, उन्हें मेरी मौत के दिन फकीरों में बांट दिया जाए. कुरान नक़ल से कमाए रुपए को शिया पवित्र समझते हैं, इसलिए उन्हें कफ़न आदि की खरीद में इस्तेमाल न किया जाए.”
जनाज़े के साथ गवैय्यों के जुलूस की उसने मनाही की थी. कब्र में सिर खुले रखने को भी लिखा था, क्योंकि औरंगज़ेब को भरोसा था कि जो पापी सम्राटों के सम्राट ख़ुदा के सामने खुले सिर पहुंचता है, उस पर वह दया करते हैं.
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