
पीलीभीत, अमृत विचार। मानसून सत्र शुरू होते ही पीलीभीत टाइगर रिजर्व प्रशासन ने ऑपरेशन मानसून’ लागू कर पांच विशेष सुरक्षा दलों के गठन और 24 घंटे निगरानी का दावा किया है। लेकिन इन दावों की हकीकत शहर से लेकर पूरनपुर तक सड़कों पर खुलेआम बिक रहे कटरुआ के बाजार में दिखाई दे रही है। एक दिन पहले ही पूरनपुर क्षेत्र में कटरुआ बिक्री करने वालों ने संविदा वनकर्मी पर हमला तक कर दिया था। इसके बावजूद अगले ही दिन मंगलवार को शहर और पूरनपुर के बाजारों में बेखौफ तरीके से कटरुआ की बिक्री होती रही।
बरसात शुरू होते ही पीलीभीत टाइगर रिजर्व के साल के जंगलों में प्राकृतिक रूप से निकलने वाला कटरुआ बड़ी संख्या में उगने लगता है। स्वाद और ऊंची कीमत के कारण इसकी मांग काफी रहती है। यही वजह है कि जंगल से सटे गांवों के लोग जान जोखिम में डालकर संरक्षित वन क्षेत्र में घुस जाते हैं और कटरुआ बीनकर बाजारों में बेचते हैं। संरक्षित क्षेत्र में आम लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध होने के बावजूद हर साल यही स्थिति देखने को मिलती है। हर वर्ष मानसून के दौरान टाइगर रिजर्व प्रशासन मानववन्यजीव संघर्ष और अवैध घुसपैठ को लेकर एडवाइजरी जारी करता है। इसमें लोगों से कटरुआ और ‘धरती के फूल’ नहीं खरीदने की अपील की जाती है तथा खरीदबिक्री करने वालों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई की चेतावनी भी दी जाती है। हालांकि, जमीनी स्तर पर सख्ती न होने से यह चेतावनी महज औपचारिकता बनकर रह जाती है। इस बार भी मानसून की दस्तक के साथ जनपद के कई बाजारों में कटरुआ और धरती के फूल खुलेआम बिक रहे हैं। इससे न केवल संरक्षित जंगलों में अवैध घुसपैठ बढ़ रही है, बल्कि वन्यजीवों और लोगों के बीच संघर्ष का खतरा भी बढ़ रहा है। ऐसे में ऑपरेशन मानसून की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। कटरुआ की मांग बढ़ने के साथ इसकी कीमत भी आसमान छू रही है। इस समय बाजार में कटरुआ 400 से 800 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। शहर के अलावा तराई के जंगलों में बरसात के मौसम में निकलने वाला कटरूआ पूरनपुर, माधोटांडा समेत आसपास की बाजारों में भी आने लगा है। पूरनपुर क्षेत्र में सर्वाधिक बिक्री कई दिनों से चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि कटरुआ बेचने वाले भी ग्राहकों के अनुसार अलगअलग दावे कर रहे हैं। सामान्य पूछताछ में कई विक्रेता इसे लखीमपुर के जंगल का कटरुआ बताते हैं, लेकिन जैसे ही कोई ग्राहक खास तौर पर पीलीभीत का कटरुआ मांगता है, वे तुरंत इसे पीलीभीत के जंगल का बताने लगते हैं।
नब्बे के दशक का चर्चित कटरुआ कांड, 29 ग्रामीणों की गई थी जान
पीलीभीत में कटरुआ केवल एक जंगली सब्जी नहीं, बल्कि एक दर्दनाक इतिहास की भी याद दिलाता है। अस्सीनब्बे के दशक में जब तराई क्षेत्र खालिस्तानी आतंकवाद से प्रभावित था, तब 31 जुलाई 1992 को पूरनपुर तहसील के दियोरिया कलां जंगल में कटरुआ बीनने गए घुंघचिहाई और शिवनगर गांव के 29 ग्रामीणों की आतंकवादियों ने निर्मम हत्या कर दी थी। आतंकवादी पहले से जंगल में छिपे हुए थे और उन्होंने ग्रामीणों को निशाना बनाया। तीन अगस्त 1992 को गढ़ा रेंज के जंगल में नदी किनारे सभी शव बरामद हुए थे। इस सामूहिक नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर दिया था। घटना के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और तत्कालीन प्रधानमंत्री के राजनीतिक सलाहकार कुंवर जितेंद्र प्रसाद ने दोनों गांवों का दौरा कर पीड़ित परिवारों से मुलाकात की थी। यह घटना आज भी कटरुआ कांड के नाम से जिले के इतिहास के सबसे चर्चित और दर्दनाक अध्यायों में गिनी जाती है।