उनकी देह भाषा किसी प्रकार की थकावट या दबाव का संकेत नहीं देती. 76 साल के नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मंचों और सार्वजनिक विमर्श में अपनी सक्रिय और दमदार उपस्थिति से संदेश देते हैं कि अगले कुछ वर्षों तक देश को नेतृत्व देने में वे पूरी तौर पर सक्षम हैं. उनकी कामयाबी में बड़ी भूमिका जनसंवाद की उनकी शैली और बदलते प्रतीकों की भी है. 2014 में उन्होंने चाय पर चर्चा को सूचनासंचार के आधुनिक साधनों के जरिए देश व्यापी विस्तार दिया था. लेकिन मोदी की खासियत है कि एक कामयाबी उन्हें कुछ नया करने से रोकती नहीं.

वे सिर्फ मन की बात करते ही नहीं. दूसरों का मन परखने में भी प्रवीण हैं. 12 साल के अंतराल पर GenZ से मुखातिब होने के लिए मोदी ने चाय की दुकान नहीं बल्कि वडोदरा में महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में रैम्प पर चलना चुना. कार्यक्रम ने संदेश दिया कि उम्र में दो पीढ़ी के अंतराल से कोई फर्क नहीं. प्रधानमंत्री मोदी युवा पीढी की अपेक्षाओंआकांक्षाओं और उनकी सोच के अनुरूप संवाद के लिए तत्पर हैं. सत्ता में PM मोदी के नेतृत्व के 25 साल पूरे हो गए हैं. पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर फिर देश के प्रधानमंत्री बनकर. उन्होंने हर पीढ़ी का दिल जीता.
गठबंधन में भी किसी दबाव में नहीं
2024 के लोकसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत न मिलने के झटके से मोदी जल्दी ही उबर गए. हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार और पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनावों में जीत ने साफ किया कि मोदी का करिश्मा बरकरार है. इसने सिर्फ भाजपा का आत्मविश्वास नहीं बढ़ाया. सहयोगियों की मोलतोल की सीमाएं भी तय कीं. उधर बंगाल के नतीजों के बाद लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस सदस्यों की बड़ी टूट ने मोदी सरकार को अतिरिक्त मजबूती दी.
पीएम मोदी गठबंधन के दबाव में नहीं आते.
अपने तीसरे कार्यकाल में मोदी ऐसी गठबंधन सरकार की अगुवाई कर रहे हैं, जिसमें भाजपा का बहुमत नहीं है. 1989 से 2014 के बीच के 25 वर्षों में देश ने कई गठबंधन सरकारें देखीं. इन सरकारों को कायम रखने के लिए कई प्रधानमंत्री बेबस नज़र आये और इसने उनकी सरकार और निजी छवि को धूमिल किया. लेकिन मोदी ऐसे किसी दबाव में नजर नहीं आते. गुजरे दो वर्षों में ऐसा कोई प्रसंग चर्चित नहीं हुआ जिसमें सहयोगियों के दबाव में मोदी सरकार किसी मसले में पीछे हटती नज़र आई हो.
लंबे समय में सत्ता में रहने पर भी सबसे आगे
निर्वाचित प्रधानमंत्री के कार्यकाल के मामले में पंडित नेहरू सहित सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों को मोदी पीछे छोड़ चुके हैं. आमतौर पर इतने लंबे समय के बाद नेता की लोकप्रियता उतार पर होती है. लेकिन हालिया सर्वेक्षणों पर अगर नज़र डाली जाए तो नरेंद्र मोदी अभी भी बहुमत की पहली पसंद बने हुए हैं. इंडिया टुडेसी वोटर के सर्वेक्षणों में फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री के रूप में 55% लोगों की पहली पसंद मोदी थे. अगस्त 2026 में यह आंकड़ा 48.7 प्रतिशत का था. इस गिरावट के बाद भी दूसरे स्थान पर रहे राहुल गांधी 27.1% की पसंद के साथ मोदी से काफी पीछे थे.
मोदी की इस सफलता का रहस्य क्या है? प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को ऐसे समय देश के नेतृत्व का अवसर मिला, जब लंबी पराधीनता के बाद देश को आजादी प्राप्त हुई थी. लोगों के सपने थे. आकांक्षाएं थीं. लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए समय, धन, संसाधनों की जरूरत थी.
निर्वाचित पीएम के कार्यकाल के मामले में मोदी नेहरू को भी पीछे छोड़ चुके हैं.
वोटरों ने धैर्य रखा. उन्हें लगातार तीन अवसर दिए. मोदी का समय आने तक वोटरों में इतना धैर्य नहीं बचा था. लेकिन फिर भी वोटरों ने उन्हें दो बार धमाकेदार जीत दिलाई. तीसरी बार थोड़ी कसर छोड़ी. लेकिन फिर भी सत्ता से दूर नहीं किया. जाहिर है कि उनकी नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों और नीयत में वोटरों का भरोसा बना रहा.
कामयाबी में बेदाग छवि की बड़ी भूमिका
पर इस भरोसे में मोदी की अपनी छवि की भी बड़ी भूमिका है. वे पच्चीस वर्ष से सत्ता में हैं. पहले मुख्यमंत्री और अब प्रधानमंत्री के पद पर. लंबे समय सत्ता में रहने पर भी उनकी ईमानदारी पर कभी सवाल नहीं उठा. बिना थके. बिना रुके. वे लगातार काम करते हैं. उनके पास विकसित भारत के लिए सोच है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। उस सोच को सच में बदलने के निरंतर प्रयास भी हैं. लेकिन चुनावी राजनीति में कामयाबी के लिए सिर्फ काम करना काफी नहीं होता. इसके लिए जनता से जुड़ाव और सतत् संवाद जरूरी होता. मोदी इस मामले में प्रतिद्वंद्वियों को काफी पीछे छोड़ते हैं.
चाय पर चर्चा कार्यक्रम की तस्वीर.
2014 की चाय पर चर्चा अभियान की याद कीजिए. यह केवल चाय की दुकानों पर जाकर मतदाताओं से मिलने का पारंपरिक कार्यक्रम नहीं था. इसमें तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अलगअलग स्थानों पर बैठे लोगों को नरेंद्र मोदी से जोड़ने का प्रयास किया गया. इस अभियान में उपग्रह, डीटीएच, इंटरनेट और मोबाइल तकनीक का संयोजन किया गया. चाय की दुकानें स्थानीय सभा स्थल बनीं और स्क्रीन के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर के नेता से संवाद का वातावरण तैयार हुआ.इस प्रयोग का महत्व उसके तकनीकी पक्ष से अधिक उसके प्रतीकात्मक पक्ष में था. एक ओर आधुनिक संचार व्यवस्था थी, दूसरी ओर चाय की साधारण दुकान. एक ओर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार था, दूसरी ओर रोजमर्रा के जीवन में व्यस्त आम नागरिक. अभियान ने इन दोनों के बीच की दूरी को दृश्य और भावनात्मक रूप से कम करने की कोशिश की.
याद रहने वाले प्रतीक चुने
चाय की दुकान को फुटपाथ संसद जैसा अर्थ देना भी इसी रणनीति का हिस्सा था. वहां होने वाली बातचीत को लोकतांत्रिक संवाद की सहज और अनौपचारिक परंपरा से जोड़ा गया.राजनीति में प्रतीक तभी प्रभावी होते हैं, जब वे याद रह सकें. चाय का प्याला ऐसा ही प्रतीक है. वह महंगा या दुर्लभ नहीं है. वह घर, दुकान, रेलवे स्टेशन और दफ्तर—हर जगह दिखाई देता है. इसी में उसकी राजनीतिक ताकत छिपी है.
2014 के अभियान में नमो टी स्टॉल और चाय पर चर्चा जैसे प्रयोगों ने चाय को एक चुनावी ब्रांड में बदल दिया. नरेंद्र मोदी की राजनीतिक पहचान को एक ऐसे दृश्य से जोड़ा गया, जिसे मतदाता आसानी से पहचान सके.मोदी के मामले में चाय का प्रतीक उनके समर्थकों के लिए सामाजिक गतिशीलता और आत्मनिर्माण का संदेश बना.आलोचकों के लिए यह चुनावी छविनिर्माण का उदाहरण रहा. दोनों दृष्टियों के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इस बात से इनकार कठिन है कि चाय ने 2014 के राजनीतिक संचार में उल्लेखनीय भूमिका निभाई.
वडोदरा के कार्यक्रम में रैम्पवॉक करते पीएम मोदी.
बढ़ती उम्र बीच शैली में बदलाव को हमेशा तैयार
समय को पकड़ कर नहीं रखा जा सकता और बदलते समय के साथ चलने के लिए सोचशैली में बदलाव जरूरी होता है. मोदी वक्त की नब्ज़ पर हाथ रखते हैं. हाल के दिनों में GenZ के प्रदर्शित आक्रोश को उन्होंने विपक्ष की साजिश या उकसावा बता कर छुट्टी नहीं ली. बल्कि उससे संवाद शुरू किया.
2014 में मोदी ने चाय पर चर्चा के जरिए राजनीति के संवाद को एक परिचित सामाजिक स्थल तक पहुंचाया था. समय बदला तो उन्होंने संवाद का मंच भी बदला. 8 सितंबर 2026 को वडोदरा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में नमो विकसित भारत कार्यक्रम में वे Yआकार के रैम्प पर चले. यह संवाद में बदलाव का एक उदाहरण था. संगीत, युवा दर्शक, मोबाइल कैमरे और ऑनलाइन पंजीकरण से सजा यह आयोजन पारंपरिक सरकारी कार्यक्रम से अलग अनुभव दे रहा था.
यहां चाय की दुकान की आत्मीयता का स्थान युवा संस्कृति की दृश्यात्मक भाषा ने लिया. रैम्प पर चलना अपने आप में कोई नीतिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि संवाद का एक नया तरीका था. अपने भाषण में AI, विकास और युवाओं की भूमिका जैसे विषयों पर युवाओं से उनके बीच प्रचलित शब्दावली में उन्होंने जुड़ने का प्रयास किया.
वोटरों का मोदी में भरोसा और उनसे उम्मीदें बरकरार हैं, यह तस्वीर यही दिखाती है.
शिकायतों के बीच भी वोटरों का भरोसा बरकार
मोदी के सार्वजनिक जीवन में संवाद के ये दो अंदाजचाय पर चर्चा और और अब युवा दर्शकों के बीच रैम्प, संकेत करते हैं कि वे वक्त के अनुरूप खुद को ढालते हैं. चाय पर चर्चा को तकनीक के सहारे उन्होंने दूर तक पहुंचाया और अब तकनीक, मंच और युवाओं को एक साथ रखकर संवाद का नया माध्यम वे रच रहें हैं. जनसंपर्क की यह यात्रा राजनीति की जरूरतों के साथ उसके मंच और माध्यमों के बदलने की भी कहानी है. 2014 में चाय पर चर्चा से शुरू यात्रा का एक नया पड़ाव Gen Z के बीच 2026 में रैम्प पर चलते नरेंद्र मोदी हैं.
दोनों प्रसंगों के बीच बारह वर्षों का अंतर है. लेकिन दोनों का एक ही उद्देश्य है कि जनता से कैसे जुड़ा रहा जाए? यक़ीनन अलग पीढ़ी से संवाद के मंच और उनकी भाषा अलग होगी. इस सच को मोदी बखूबी समझते हैं. मोदी पर सिर्फ केंद्र सरकार की अगुवाई की जिम्मेदारी नहीं है. वे लोकसभा से राज्य विधानसभाओं के चुनावों तक के लिए 2014 से पार्टी का चेहरा बने हुए हैं. उनका कद इतना बड़ा हो गया है कि विपक्षी भाजपा से ज्यादा मोदी को हराने की बात करते हैं. मोदी की कामयाबी पार्टी को चुनाव जिताने और उसकी सरकारें बनाने तक सीमित नहीं है. उससे भी बड़ी उनकी कामयाबी यह है कि केंद्र और विभिन्न राज्यों की भाजपा सरकारों से शिकायतों और अधूरी अपेक्षाओं के बीच भी वोटरों का मोदी में भरोसा और उनसे उम्मीदें बरकरार हैं.