How Screen Time Affects Health: आज का युग डिजिटल है। हमारे आसपास की हर चीज डिजिटलाइज हो गई है और इस दौर में मोबाइल, लैपटॉप और टीवी हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। बच्चे हों या बड़े, घंटों स्क्रीन पर समय बिताते है।

लेकिन, क्या आप जानते हैं कि ज्यादा स्क्रीन टाइम आपकी फिजिकल हेल्थ के साथसाथ इमोशनल हेल्थ को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है? हाल ही में कई स्टडीज में यह बात सामने आई है कि स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने से लोगों में तनाव, चिंता, चिड़चिड़ापन और अकेलापन जैसे लक्षण बढ़ रहे हैं।
स्क्रीन टाइम का भावनात्मक असर
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नींद पर असर
स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन को प्रभावित करती है, जिससे स्लीप साइकिल बिगड़ता है। नींद की कमी से मूड खराब होता है और मानसिक थकावट बढ़ती है। नींद पूरी न होने पर चिड़चिड़ाहट बढ़ती है।
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सामाजिक जुड़ाव कम होना
स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने से आमनेसामने की बातचीत यानी फेसटूफेस होने वाली बातचीत कम हो जाती है। इससे सामाजिक कौशल कमजोर होते हैं और अकेलापन महसूस होने लगता है।
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डोपामाइन की लत
तेज गति वाली डिजिटल सामग्री बारबार देखने से यानी स्क्रोलिंग की आदत से दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है। धीरेधीरे शरीर इसकी आदत बना लेता है और असली खुशी महसूस करना मुश्किल हो जाता है।
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आत्मसम्मान पर असर
सोशल मीडिया पर अवास्तविक तुलना और साइबरबुलिंग से किशोर युवाओं में नकारात्मक सोच बढ़ने लगता है और वे खुद की काबिलियत पर संदेह करने लगते हैं।
पेट की समस्या के लिए भी जिम्मेदार
अधिक स्क्रीन टाइम से अगर आपकी नींद खराब होगी तो इसका असर आपके पाचन तंत्र पर भी होगा। दिमाग और आंत के बीच एक जुड़ाव होता है, जो अनिद्रा के चलते असंतुलित हो सकता है। खराब नींद आंत के माइक्रोबायोम को बिगाड़ती है। इससे आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया कम हो जाते हैं। सेरोटोनिन का स्तर प्रभावित होने, चिंता और मूड खराब होने जैसी समस्याएं आंत की फंक्शनिंग को प्रभावित करती है। खराब नींद और पाचन की समस्या से पूरे शरीर में इंफ्लेमेशन बढ़ सकता है। इससे दिमाग तेजी से बूढ़ा होने लगता है।
दिमाग पर कैसे होता है असर?
तकनीक के जमाने में स्क्रन पर अधिक समय बिताना एक नशे की तरह है। जब भी आप इंटरनेट मीडिया फीड को रिफ्रेश करते हैं या वीडियो गेम में एक राउंड आगे बढ़ते हैं तो का संकेत मिलता है, जो बारबार ऐसा ही करने के लिए आपको प्रेरित करता है। इससे प्रीफ्रंटल कार्टेक्स कमजोर होने लगता है। इससे आपकी इच्छाओं पर आपका नियंत्रण बहुत मुश्किल हो जाता है। इंटरनेट गेमिंग या इंटरनेट मीडिया डिसऑर्डर से पीड़ित लोगों की ब्रेन इमेजिंग पर किए गए अध्ययन में बताया गया है कि मस्तिष्क में संरचनात्मक और कार्यात्मक बदलाव आ रहे हैं।
नींद नहीं आना
आंखों पर लगातार ब्लूलाइट के सामने रहने से रात की नींद में बाधा आती है और शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक का संतुलन बिगड़ता है। अगर आप देर रात स्क्रॉल करते रहते हैं, तो यह सोने के समय को बढ़ा देता है। स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट नींद के लिए जिम्मेदार हार्मोन को दबाती है। इससे सुबह उठने पर आपको लगता है कि रात की नींद सही ढंग से पूरी नहीं हुई है। साथ ही सोनेजागने का समय भी अव्यवस्थित होता है और दिन में आपको हर समय थकान महसूस होती है। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। अगर आप छह घंटे से कम सोते हैं तो धीरेधीरे याददाश्त कमजोर होने लगती है और डिमेंशिया का जोखिम बढ़ सकता है।