अमेरिका में ”राइडर टीम” पहुंचती थी घर से नकदी लेने

अमेरिका में ”राइडर टीम” पहुंचती थी घर से नकदी लेने
अमेरिका में ”राइडर टीम” पहुंचती थी घर से नकदी लेने

कार्यालय संवाददाता, लखनऊ, अमृत विचार: सुशांत गोल्फ सिटी स्थित ओमेक्स आर2 में संचालित अंतरराष्ट्रीय टेक्निकल सपोर्ट स्कैम की जांच के आरोपियों से पूछताछ में नया खुलासा हुआ। जांच में सामने आया कि गिरोह केवल फर्जी टेक्निकल सपोर्ट बेचने तक सीमित नहीं थी। अमेरिका में सक्रिय ”राइडर टीम” पीड़ितों के घर पहुंचकर नकदी भी एकत्र करती थी। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इसके अलावा ठगी की रकम हवाला नेटवर्क के जरिए भारत में बैठे संचालकों तक पहुंचाई जाती थी।

एडीसीपी क्राइम किरन यादव के मुताबिक, गिरोह अमेरिकी नागरिकों के कंप्यूटर पर फर्जी वायरस और सिक्योरिटी अलर्ट दिखाकर उन्हें टोलफ्री नंबर पर कॉल करने के लिए मजबूर करता था। कॉल भारत स्थित कॉल सेंटर में रिसीव होती थी, जहां एजेंट खुद को माइक्रोसॉफ्ट टेक्निकल सपोर्ट या साइबर सिक्योरिटी अधिकारी बताकर एनी डेस्क और अल्ट्रा व्हीवर जैसे रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर के जरिए कंप्यूटर का नियंत्रण हासिल कर लेते थे। जांच में सामने आया कि अमेरिका में अलग राइडर टीम पीड़ितों के घर जाकर नकदी जुटाती थी।

ठगी की रकम पहले अमेरिका में इकट्ठा होती थी और कमीशन काटने के बाद हवाला चैनलों से भारत भेजी जाती थी। गिरोह एमजॉन गिफ्टकार्ड, वॉल्मार्ट पेमेंट बारकोड व कैश पिकअप जैसे तीन अलगअलग तरीकों से रकम वसूलता था। पीड़ित के बैंक खाते का बैलेंस देखने के बाद उसकी आर्थिक स्थिति के अनुसार ठगी का तरीका तय किया जाता था। सामान्य कंप्यूटर लॉग और नेटवर्क कनेक्शन को हैकिंग का सबूत बताकर लोगों को डराया जाता था।

अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क, डिजिटल साक्ष्यों, हवाला चैनलों की जांच शुरू

एडीसीपी क्राइम के मुताबिक पुलिस टीम का पूरा फोकस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क, डिजिटल साक्ष्यों, हवाला चैनलों और मनी ट्रेल पर है। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि भारत और अमेरिका में सक्रिय इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की क्या भूमिका रही। गिरोह के सदस्य पीड़ित से Alt F4, Ctrl Alt delete या Task Manager के जरिए पॉपअप बंद कराते थे। इसे अपनी तकनीकी विशेषज्ञता बताकर भरोसा जीतते थे। इसके बाद एनी डेस्क या अल्ट्रा व्हीवर जैसे रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर इंस्टॉल कराकर कंप्यूटर का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लेते थे। फिर इवेंट व्हीवर व कमांड प्रॉम्ट में सामान्य एरर लॉग व नेटवर्क कनेक्शन दिखाकर दावा किया जाता था कि विदेशी हैकर कंप्यूटर में घुस चुके हैं और बैंक खाते व निजी जानकारी खतरे में है।

49 से 129 डॉलर तक के बेचते थे फर्जी सिक्योरिटी प्लान

पुलिस के मुताबिक पीड़ित को डराने के बाद उसे तीन, छह और 12 महीने के फर्जी टेक्निकल सपोर्ट प्लान 49, 89 और 129 अमेरिकी डॉलर में बेचे जाते थे। शुरुआती भुगतान के बाद कॉल क्लोजर टीम को ट्रांसफर कर दी जाती थी, जो खुद को साइबर सिक्योरिटी विभाग, फ्रॉड प्रिवेंशन यूनिट या फेडरल ट्रेड कमीशन का अधिकारी बताकर आगे की ठगी को अंजाम देती थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *