Quick Samachar: ग्लोबल एनर्जी मार्केट और इंटरनेशनल डिप्लोमेसी के इतिहास में एक ऐसा बड़ा उलटफेर हुआ है, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. लंबे समय से एकदूसरे के कट्टर दुश्मन रहे अमेरिका और ईरान के बीच आखिरकार एक ऐतिहासिक शांति समझौता हो गया है. इस महासमझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई है.

बुझी कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग! इकोनॉमी के लिए कैसे गेमचेंजर साबित होगी US-ईरान डील​
बुझी कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग! इकोनॉमी के लिए कैसे गेमचेंजर साबित होगी US-ईरान डील​

अगर आंकड़ों पर गौर करें तो 10 जून के बाद से खाड़ी देशों का कच्चा तेल अब तक 15.70 फीसदी से ज्यादा सस्ता हो चुका है. जबकि अमेरिकी क्रूड के दाम में 16 फीसदी से ज्यादा की गिरावट देखने को मिल चुकी है. खबर लिखे जाने तक कच्चे तेल की कीमतों में 6 फीसदी की गिरावट देखने को मिल रही थी. इसका मतलब है कि इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड के दाम 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ चुके हैं. इसका मतलब है कि खाड़ी देशों का कच्चा तेल करीब 105 दिन के लोअर लेवल पर आ चुका है.

खास बात तो ये है कि इस ग्लोबल पीस के बाद कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी असल जश्न भारत मना रहा है. अमेरिकाईरान की यह ऐतिहासिक डील इंडियन इकोनॉमी के लिए एक बड़ा ‘गेम चेंजर’ साबित होने जा रही है. आइए बारीकी से समझते हैं कि कच्चे तेल की यह मंदी भारत के लिए कितनी बड़ी लॉटरी है और क्या यह राहत लंबे समय तक टिकने वाली है?

क्यों आई कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट?

पिछले कई सालों से ईरान पर लगे कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण वह वैश्विक बाजार में खुलकर अपना कच्चा तेल नहीं बेच पा रहा था. इसके अलावा मिडिल ईस्ट में युद्ध की आशंकाओं के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतें हमेशा आसमान छू रही थीं. अब जब शांति समझौता हो गया है और ईरान पर से प्रतिबंध हटने का रास्ता साफ हो गया है. तो कच्चे तेल की कीमतें तेजी से नीचे की ओर आ रही हैं. ईरान के पास तेल का विशाल भंडार है, और इसके बाजार में आते ही कच्चे तेल की वैश्विक सप्लाई अचानक बढ़ गई है. जानकारों का कहना है कि खाड़ी देशों में युद्ध का खतरा टलने से क्रूड ऑयल के दामों से ‘जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम’ गायब हो गया है, जिससे कीमतें तेजी से नीचे आई हैं.

भारतीय इकोनॉमी के लिए कैसे खुली ‘लॉटरी’?

  1. भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक डॉलर की भी गिरावट भारत को अरबों रुपए का फायदा पहुंचाती है.
  2. भारत में ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट का सीधा संबंध डीजल और पेट्रोल की कीमतों से है. तेल सस्ता होने से माल ढुलाई सस्ती होगी, जिससे फल, सब्जियां और रोजमर्रा के सामानों की कीमतें कम होंगी. आम आदमी को महंगाई से बड़ी राहत मिल सकती है.
  3. कच्चे तेल के आयात के लिए भारत को सबसे ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. तेल सस्ता होने से देश का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा और डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया मजबूत होगा.
  4. सरकार का चालू खाता घाटा कंट्रोल में आएगा, जिससे सरकार को देश के भीतर इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च करने की आजादी मिलेगी.

बड़ा सवाल: क्या हमेशा के लिए सस्ता रहेगा यह तेल?

अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि​ क्या तेल की यह मंदी लंबे समय तक टिक पाएगी? बाजार विश्लेषकों का मानना है कि शॉर्ट टर्म में भारत के लिए स्थिति बेहद अनुकूल है. हालांकि, लॉन्गटर्म स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि ओपेक प्लस देश इस डील पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं. यदि ओपेक देशों ने अपनी तरफ से तेल उत्पादन में कटौती कर दी, तो कीमतों को फिर से सहारा मिल सकता है. लेकिन फिलहाल, ईरान की बाजार में वापसी इतनी बड़ी है कि कीमतें जल्द ऊपर जाने वाली नहीं हैं.

अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह शांति समझौता केवल दो देशों की कूटनीतिक जीत नहीं है, बल्कि यह भारत जैसी उभरती इकोनॉमीज के लिए एक बड़ा बूस्टर डोज है. यदि कच्चे तेल की ये कम कीमतें अगले दोतीन तिमाहियों तक बनी रहती हैं, तो भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट को एक नई रफ्तार मिलना तय है और दलाल स्ट्रीट पर भी चौतरफा हरियाली देखने को मिल सकती है.

क्रूड ऑयल

कच्चे तेल के मौजूदा दाम

कच्चे तेल की कीमतों में काफी बड़ी गिरावट देखने को मिल चुकी हे. 10 जून के बाद से कच्चे तेल के दाम 16 फीसदी से ज्यादा कम हो चुके हैं. आंकड़ों को देखें तो 10 जून को खाड़ी देशों का कच्चा तेल ब्रेंट क्रूड 93.10 डॉलर प्रति बैरल पर था, जो कम होकर 78.46 डॉलर प्रति बैरल पर देखने को मिला. इसका मतलब है कि खाड़ी देशों का कच्चा तेल 14.64 डॉलर प्रति बैरल यानी 15.72 फीसदी सस्ता हो चुका है. वहीं दूसरी ओर अमेरिकी कच्चा तेल डब्ल्यूटीआई के दाम में भी बड़ी गिरावट देखने को मिल चुकी है. 10 जून को डब्ल्यूटीआई के दाम 90.03 डॉलर प्रति बैरल थे, जो मौजूदा समय में 75.53 डॉलर प्रति बैरल पर दिखाई दे रहे हैं. इसका मतलब है कि कच्चे तेल की कीमत में 14.5 डॉलर प्रति बैरल यानी 16 फीसदी से ज्यादा की गिरावट देखने को मिल चुकी है.